किसी भी समाज के लिए विकास के साथ-साथ उस समाज के लिए यह भी अहम् है कि वह समाज अपनी भाषा-साहित्य, संस्कृति व सामाजिक सरोकारों के संरक्षण के लिए काम करे। कहते हैं कि जिस समाज की अपनी भाषा नहीं होती वह समाज धीरे-धीरे अपनी पहचान खो देता है। शायद इसीलिए उत्तराखण्ड राज्य आंदोलन में हमारी पहचान भी अहम् मुद्दा था और इस पहचान का मतलब हमारी भाषा, साहित्य, संस्कृति व सामाजिक सरोकारों का संरक्षण व सम्प्रेषण मुख्य था। लेकिन उत्तराखण्ड राज्य बनने के 25 साल बाद भी हमारी गढ़वाली, कुमाउनी, जौनसारी भाषाएँ आज भी हासिये पर खड़ी हैं। इन भाषाओं को उत्तराखण्ड सरकारों में कोई पूछने वाला नहीं है लेकिन दिल्ली में ऐसा नहीं है। दिल्ली में वर्ष 2019 में तत्कालीन सरकार ने गढ़वाली, कुमाउनी, जौनसारी अकादमी बनाकर हमारी भाषाओं व संस्कृति को एक पहचान देने का काम किया है। कहते हैं दिल्ली एनसीआर में उत्तराखण्ड के गढ़वाल व कुमाऊं से लगभग तीस-पैंतीस लाख लोग निवास करते हैं। इतने बड़े समाज को उनकी भाषा-साहित्य व संस्कृति के संरक्षण के लिए सुनहरा मौका देती है गढ़वाली, कुमाउनी, जौनसारी अकादमी।
दिल्ली में वर्ष 2019 में गढ़वाली, कुमाउनी, जौनसारी अकादमी का गठन होने के बाद अकादमी लगातार उत्तराखण्ड के समाज की भाषा, साहित्य, संस्कृति व सामाजिक सरोकारों के लिए लगातार आयोजन करती आ रही है। जबकि उत्तराखण्ड राज्य में अभी तक इन भाषाओं के लिए कोई ख़ास पहल सरकार के स्तर पर नहीं हो रहे हैं। उत्तराखण्ड सरकार ने इन भाषाओं को अन्य भाषाओं के साथ बांधकर सिर्फ खानापूर्ति की है। लेकिन दिल्ली में अकादमी लगातार काम कर रही है। जिनमें सांस्कृतिक आयोजन, नाट्य समारोह, भाषा सेमिनार/गोष्ठियां आदि का आयोजन लगातार अकादमी लगातार कर रही है। विशेषकर बच्चों के लिए नाट्यशालाओं व भाषा कार्यशालाओं का आयोजन मुख्य है।
वर्ष 2019 में गढ़वाली, कुमाउनी, जौनसारी अकादमी के पहले उपाध्यक्ष उत्तराखण्ड के जनकवि, लोक गायक पहाड़ की आवाज़ स्वर्गीय हीरा सिंह राणा जी बने, अकादमी के पहले सचिव डॉ. जीतराम भट्ट ने भी अकादमी के गठन में अहम् योगदान दिया। स्वर्गीय हीरा सिंह राणा के आकस्मिक निधन के बाद वरिष्ठ समाजसेवी/ उद्यमी मनवर सिंह रावत बने। श्री रावत के बाद कुलदीप सिंह भंडारी अकादमी के उपाध्यक्ष बने व डॉ जीतराम भट्ट के बाद अकादमी के सचिव संजय गर्ग बने। वर्तमान में अकादमी की द्विवार्षिक कार्यकारणी का गठन नहीं हुआ है। उसके बावजूद भी अकादमी लगातर कार्य कर रही है और इसका श्रेय वर्तमान दिल्ली सरकार व अकादमी के सचिव संजय गर्ग को जाता है।
गढ़वाली, कुमाउनी,जौनसारी अकादमी दिल्ली के सचिव संजय गर्ग का कहना है कि दिल्ली में अकादमी के माध्यम से हम बहुत कुछ करना चाहते हैं। आने वाले समय में साहित्य सम्मान, पुस्तक प्रकाशन सहयोग, पुस्तकालय स्थापना आदि मुख्य विन्दु हैं जिनपर अकादमी कार्य करेगी। इसके अतिरिक्त जो भी उत्तराखण्ड समाज की भाषा, साहित्य, संस्कृति व रंगमंच के लिए हो बनेगा अकादमी के माध्यम से हर संभव कोशिश की जाएगी।
हाल ही में गढ़वाली, कुमाउनी,जौनसारी अकादमी दिल्ली ने गढ़वाली, कुमाउनी, जौनसारी भाषाओं पर एक दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। जो कि अकादमी के गठन के बाद इस प्रकार का पहला आयोजन था। इस आयोजन में दो दिन में विद्वानों ने भाषा, साहित्य की हर विधा पर विचार विमर्श किया। साथ ही गढ़वाली,कुमाउनी भाषाओं को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने के संकल्प को दोहराया साथ ही उत्तराखण्ड सरकार से गढ़वाली,कुमाउनी भाषाओं को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने का प्रस्ताव विधानसभा से पास करके केंद्र सरकार को भेजे व इन भाषाओं के लिए अलग अकादमी उत्तराखण्ड में बनाई जाए।
वरिष्ठ साहित्यकार रमेश चंद्र घिल्डियाल सरस ने कहा कि दिल्ली में गढ़वाली, कुमाउनी,जौनसारी अकादमी दिल्ली बहुत अच्छा कार्य कर रही है। हमें उम्मीद है कि दिल्ली में हमारी अकादमी के गठन के बाद उत्तराखण्ड सरकार भी हमारी भाषाओं के लिए अकादमी का गठन करेगी। वरिष्ठ साहित्यकार रघुवरदत्त शर्मा राघव ने कहा कि अकादमी के हर आयोजन में हमारी संस्कृति, भाषा व सामाजिक सरोकारों के लिए एक सन्देश होता है। विगत 7 व 8 सितम्बर, 2025 की दो दिवसीय भाषा संगोष्ठी इस दिशा में मील का पत्थर साबित होगी। वरिष्ठ साहित्यकार गिरीश बिष्ट हंसमुख ने कहा कि दिल्ली में गढ़वाली, कुमाउनी,जौनसारी अकादमी द्वारा किये जा रहे आयोजनों में हमारे समाज के हर वर्ग के लोग शामिल होते हैं इससे नई पीढ़ी को अपने सरोकारों से जुड़ने और समझने मौका मिलता है। पिथौरागढ़ में लगातार कई वर्षों से भाषा आन्दोलन की ध्वजवाहक आदलि कुशलि पत्रिका की संपादक डॉ सरस्वती कोहली ने कहा की दिल्ली जैसे महानगर में अकादमी द्वारा निरन्तर हमारे सरोकारों पर आयोजन अपने आप में अनुकरणीय हैं। वरिष्ठ रंगकर्मी/साहित्यकार दर्शन सिंह रावत ने कहा कि अकादमी के आयोजनों से हमारे रंगमंच को एक नया आयाम मिला है। अकादमी न सिर्फ सांस्कृतिक, नाटक, कार्यशाला व भाषा संगोष्ठी करती है बल्कि ऐसे आयजनों के लिए रजिस्टर्ड संस्थाओं को सहयोग भी देती है। जिससे आर्थिक तंगी झेल रहे अधिकांश संगठन/संस्थाएं अकादमी के सहयोग से बड़े-बड़े आयोजन कर रही हैं।
वरिष्ठ समाजसेवी अनिल कुमार पंत ने कहा कि दिल्ली में गढ़वाली, कुमाउनी,जौनसारी अकादमी बहुत अच्छा कार्य कर रही है। समाज के हर वर्ग को अकादमी के अच्छे कार्यों में सहयोग करना चाहिए। हम लोगों को अपनी सोच बड़ी रखनी होगी। संकुचित सोच से कोई भी समाज व व्यक्ति कभी आगे नहीं बढ़ सकता। इसलिए वही समाज और व्यक्ति आगे बढ़ता है जिसकी बड़ी सोच हो। बरिष्ठ रंगकर्मी, साहित्यकार व चिठ्ठी-पत्री पत्रिका एक संपादक मदन मोहन डुकलाण ने का कि आज दिल्ली में अकादमी हर छेत्र में आयोजन कर रही है, संस्थाओं को आर्थिक मदद कर रही है ऐसा ही उत्तराखण्ड सरकार को भी करना चाहिए। ताकि उत्तराखण्ड में भी हमारी भाषा-साहित्य व संस्कृति के संरक्षण एक छेत्र में और गति से काम हो।
उत्तराखण्ड राज्य आंदोलनकारी श्री उमेश रावत ने कहा कि उत्तराखण्ड में गढ़वाली, कुमाउनी, जौनसारी भाषाओं के लिए अलग अकादमी बहुत जरुरी है। श्री पंत ने कहा कि हमारे लोगों ने राज्य के लिए बलिदान दिए, संघर्ष किया इसलिए आज पच्चीस साल बाद भी हमारी भाषाएँ बेगानी से हैं इस तरफ सरकारों को ध्यान देना चाहिए।
युवा कवि अर शोधार्थी श्री आशीष सुंदरियाल ने कहा कि गढ़वाली, कुमाउंनी, जौनसारी अकादमी यूनेस्को द्वारा संकटग्रस्त घोषित इन भाषाओं के संरक्षण हेतु विशेष प्रयास कर रही है। साथ ही युवाओं को भी अपनी मातृभाषाओं से जोड़ने का अवसर प्रदान कर रही है। वर्तमान में युवाओं को अपने भाषाई सरकारों से जोड़ना बहुत अहम् है। ताकि आज के युवा कल अपने सरोकारों के साथ – साथ अपनी भाषा को भी दृढ़ता से संजोने का कार्य कर सकते हैं।
उत्तराखण्ड लोक-भाषा साहित्य मंच, दिल्ली के संयोजक दिनेश ध्यानी ने बताया कि मंच पिछले लगभग पन्द्रह साल से गढ़वाली, कुमाउनी भाषाओं को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग कर रहा है। दिल्ली में गढ़वाली, कुमाउनी,जौनसारी अकादमी द्वारा भाषा-साहित्य पर आयोजन कहीं न कहीं हमारी मांग को नैतिक बल देते हैं। अकादमी लगातार आयोजन कर रही है यह अपने आप में बड़ी बात है। जब से अकादमी का गठन हुआ है हमारे समाज के हर आयोजन में एक गति से आ गयी है। श्री ध्यानी ने बताया कि दिल्ली में मकरैणी /उत्तरैणी के आयोजनों में भी गढ़वाली, कुमाउनी,जौनसारी अकादमी दिल्ली लगातर सहयोग देती है। हाल ही में मंच के एक आयोजन में दिल्ली की मुख्यमंत्री श्रीमती रेखा गुप्ता ने घोषणा की है कि दिल्ली सरकार दिल्ली में छठ की तरह मकरैणी /उत्तरैणी के आयोजनों को भी आयोजित करेगी। इसलिए हम सबको अपनी भाषा-साहित्य, संस्कृति व सरोकारों के लिए एकजुट होकर काम करना चाहिए। अगर हमारा विज़न बड़ा होगा तो हम बतौर एक समाज बड़े लक्ष्य हासिल कर सकते हैं। इसलिए समाज में सकारात्मक सोच और एकजुट होकर ही बड़े लक्ष्य हासिल किये जा सकते हैं। जैसे दिल्ली एनसीआर के सभी संगठनों ने व समूचे समाज ने दिल्ली में अपनी एकता के दम पर गढ़वाली, कुमाउनी, जौनसारी अकादमी का गठन करवाया।
कुल मिलाकर दिल्ली में गढ़वाली, कुमाउनी, जौनसारी अकादमी बहुत अच्छा कार्य कर रही है। भाषा, साहित्य व संस्कृति के संरक्षण के लिए ऐसे आयोजन निरंतर होते रहेंगे ऐसी कामना है। और यह सब तभी संभव होगा जब उत्तराखण्डी समाज एकजुट होकर और बड़े लक्ष्यों को साधने के लिए कार्य करेगा।



Recent Comments