Saturday, May 2, 2026
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87 साल ललित केशवान जी का जन्मदिन पर विशेष

 (दिनेश ध्यानी) 
 गढ़वाली और  हिन्दी के वरिष्ठ साहित्यकार   ललित केशवान 17 अगस्त, 2025 को  87 साल के हो गए हैं। साहित्यिक बिरादरी में  तीन पीढ़ियों के साथ साहित्य सृजन व मंच साझा करने का  सौभाग्य ललित केशवान  को लगातार मिल रहा है,  हर भाव  में  प्रसन्न व हंसमुख रहने वाले  केशवान ने   हास्य, बाल साहित्य, नाटक, कविता, कहानी, एकांकी, उपन्यास समेत साहित्य की हर विधा में सृजन किया है ।
    आपकी हास्य कविता गढ़वाली व हिंदी में  खूब पसन्द की जाती हैं।   दिल्ली का अशोका होटल बिटिन लगभग सताईस साल पहले  सेवानिवृत होकर आप लगातार साहित्य सृजन में रत हैं।
केशवान की प्रकाशित मुख्य कृतियों में  खिल्दा फूल हंसदा पात- गढवाली कविता संग्रह, हरि हिण्डवाण – ऐतिहासिक गढ़वाळी नाटक हिन्दी म भी, दिख्यां दिन तप्यां घाम- गढ़वाळी कविता संग्रह, सब मिलीक रौंला हम- गढ़वाळी बाल कविता संग्रह, दीवा ह्वैजा दैणी- गढ़वाळी गढवाली खण्ड काव्य, जै बदरी नारैण- पांच गढवाली नाटक संग्रह, गंगू रमाला-पौराणिक गढ़वाळी एकांकी सग्रह, जब गरदिस मा गरदिस ऐन- गढ़वाळी कविता सग्रह मुख्य छन अर एक गढ़वाळी कहानि संग्रै अज्यों छपेणां खातिर तैयार छ। अर हिन्दी म बि आपन साहित्य सृजन कैरि जौं मद्दे हिन्दी की मुख्य कृति छन। जो है मेरा देश- हिन्दी कविता संग्रह, सबको गले लगाते फूल – हिन्दी बात कविता संग्रह, छोटी सी गुड़िया थी- हिन्दी बाल कविता संग्रह, अंधेरों के साये में – हिन्दी उपन्यास, हाथी दादा की चौपाल – हिन्दी बाल कहानी संग्रह, हमारी एकता जिन्दावाद- हिन्दी बाल कहानी संग्रह, उड़नतश्तरी –  हिन्दी बाल कहानी संग्रह आदि मुख्य  हैं । इसके अतिरिक्त आपने कई पुस्तकों का संपादन किया व कई नवोदित लेखकों को लिखने के लिए प्रेरित किया।
उत्तराखण्ड लोक भाषा  साहित्य मंच दिल्ली के  प्रयासों से सन् 2016  से दिल्ली एनसीआरमें नई पीढ़ी को  गढ़वाळी-कुमाउनी कक्षाओं को हर साल आयोजन में  आपकि अग्रणी भूमिका रहती है ।
ललित केशवान  को  साहित्य सेवा के लिए मिले सम्मानों में मुख्य हैं-  गढवाली साहित्य परिषद कानपुर द्वारा पं. आदित्यराम नवानी साहित्य सम्मान- 1984,  हिन्दी अकादमी सबको गले लगाते हिन्दी बाल कविता संग्रह पर सम्मान- 1987,  गढवाली ऐतिहासिक नाटक हरि हिण्डवाण के लिए उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा डॉ. पीताम्बर दत्त बड़थ्वाल अनुशंसा पुरस्कार 1989,  उत्तराखण्ड विचार मंच मुम्बई द्वारा श्री अर्जुनसिंह गुसांई स्मृति साहित्य सम्मान – 2010, अखिल भारतीय उत्तराखण्ड महासभा द्वारा उत्तराखण्ड गौरव सम्मान7 2011,  म्यर पहाड़ संस्था द्वारा सम्मान- 2011, अखिल गढ़वाल सभा देहरादून द्वारा गढविभूति सम्मान – 2011, 8. उत्तराखण्ड लोकभाषा साहित्य मंच द्वारा महाकवि कन्हैयालाल डंडरियाल साहित्य सम्मान- 2012, महेश्वरी देवी कुलानन्द बुड़ाकोटी स्मृति न्यास द्वारा महेश्वरी देवी कुलानन्द बुड़ाकोटी स्मृति सिहत्य सम्मान – 2015।  चिट्ठी सम्मान- 2021 समेत कै सम्मान व पुरस्कार मिलिन। हौरि सम्मानौ म जौंमा चन्द्रकुवंर बर्त्वाल साहित्य सृजकश्री सम्मान, उत्तराखण्ड आर्य समाज विकास समिति द्वारा साहित्य सेवा सम्मान, भयात संस्था द्वारा वरिष्ठ साहित्यकार सम्मान, बहादुर सिंह बनोला स्मृति साहित्य सम्मान, उत्तराखण्ड साहित्य सेवी सम्मान उत्तराखण्ड क्लब द्वारा, उत्तराखण्ड जनसम्पर्क मंडल द्वारा साहित्य सम्मान, कुर्मांचल समाज द्वारा सम्मान, उत्तराखण्ड प्रचार, उप्रसार समिति द्वारा सम्मान, उत्तराखण्ड साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्था द्वारा साहित्य सम्मान आदि प्रमुख सम्मान हैं ।
उत्तराखण्ड लोक भाषा साहित्य मंच दिल्ली, के संयोजक दिनेश ध्यानी ने बताया कि उत्तराखण्ड लोक-भाषा साहित्य मंच, दिल्ली द्वारा   20 अगस्त, 2023 को श्री ललित केशवान जी की 65 साल की साहित्यिक यात्रा के  अवसर पर केशवान जी को लाइफटाइम अचीवमेंट साहित्य सेवा (आजन्म साहित्य सेवा सम्मान) से सम्मानित किया ।  जिसमें सम्मान म 51 इक्यावन हजार रुपया कि  सम्मान राशि, अंगवस्त्र, मानपत्र आदि भेंटकिया गया ।  उत्तराखण्ड की किसी भी साहित्यिक संस्था  द्वारा दिया गया यह सबसे बड़ा साहित्य सम्मान है।
गढ़वाली-कुमाउनी भाषाओं को संविधानै आठवीं अनुसूची में शामिल करने के लिए आपका योगदान योगदान अद्वितीय है । श्री ललित केशवान जी का कहना है कि अगर गढ़वाली, कुमाउनी भाषाओं को  संविधानै आठवीं अनुसूची में  शामिल करने के लिए हमें  आजीवन आमरण अनशन करना पड़े तो हम तैयार हैं।   श्री केशवान जी की लगभग पांच पुस्तकें अभी  अप्रकाशित हैं।  आकाशवाणी, दूरदर्शन से आपकी रचनाएँ लगभग पचास सालों  प्रसारित होती रही हैं। हम भगवान् से कामना करते हैं कि  वरिष्ठ साहित्यकार श्री ललित केशवान जी लेखनी लगातार यूँ ही चलती रहे।  वे दीर्घायु हों।
 ललित केशवान की दो कविता :
 हम्हरि भाषा
अज्यूंतैं भी हम्हरि भाषा कनटपराण लगीं चा
बाछी सी बिगर ब्वे की जन रमाण लगीं चा।
हम्हरा सांसद संसद मा किलै बौं हौड प्वड्यांन
भग्यनु कनि निन्द प्वडीं च एसी मा फसोरि सियांन।
सड़सट साल ह्वे गेन अज्यूं भी निन्द नी खुली
गढ़वळि, कुमाउनी, जौनसरी दुध बोली किलै भूली।
संसद मा चौबीस भाषा क्य गुलछर्रा उड़ौंणी छन
नचणीं छन, नचाणी छन हॅंसणी छन हॅंसाणी छन।
कसम तुम मात्र भाषा की उठा अब कमर कस लयादी
सच्चा हम उत्तराखण्डी छां चन्द्रसिंह गढ़वळि बणि जांदी।
  बाज
मिन बोलि बोडाजी
अब त अपणु राज ऐगे
सत्ता बी अपणा हात मा
पत्ता समेत ऐगे
परसे मंत्री जी छा बोलणा
बल चिन्ता नि कारा
जरा धीरज धारा
अब त सब जातिवाद का
जत्या नथे जाला
अर समाजवाद का बेपुच्छा सांड पळे जाला।
बोडाजी न बोलि बाबा
बाद-बाद त मि नि जणदो
पण हां बाज-बाज बोल
अज्काल सब बाज बण्यां छन
जातिबाज, पैसाबाज, दारूबाज, ध्वकाबाज
छुर्राबाज, तुर्राबाज, लगडिबाज, गवदडिबाज,
पत्तीबाज, गप्पीबाज, लटकाबाज, झटकाबाज,
सटकाबाज, पटकाबाज
अब त वी बोल लाटा
जख इथगा बाजी बाज ह्वाला
वे मुल्का क्य हाल ह्वाला।।
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