हरिद्वार, आबादी वाले क्षेत्रों में हाथियों व तेंदुए जैसे जानवरों की तेजी से बढती आवाजाही को लेकर देश के प्रमुख जाने माने पर्यावरणविद्व व जीव वैज्ञानिक प्रोफेसर बी.डी.जोशी का कहना है कि आवासीय क्षेत्रों मे हाथियों की आवाजाही का प्रमुख कारण जहां वन क्षेत्रों से सटे क्षेत्रों मे आवासीय बस्तियों का लगातार निर्माण होना एक प्रमुख कारण है।वही हाथियों का क्षेत्र विशेष से लगाव होना भी एक प्रमुख कारण है।
डा० जोशी का कहना है कि हाथी बहुत ही संवेदनशील जानवर होता है। इसकी यादाश्त बहुत तेज होती है। जिसके चलते यह अपने मस्तिष्क मे सालों पुरानी अपनी याद के चलते उसी पुराने मार्ग को अपनी आवाजाही के लिए चुनता है।तथा बहुत ही विपरीत स्थिति में अपने मार्ग को बदलता है।
हाथियों के डी.एन.ए मे यादाश्त समाहित होती है।जिसके चलते लंबे समय तक हाथियों के समुह अपना मार्ग नहीं बदलते है। एक हाथी की आयु लगभग 60 साल तक होती है।
डा० जोशी का कहना है कि जिन आवासीय बस्तियों व क्षेत्रों में हाथियों की आवाजाही लगातार बनी रहती है।उन क्षेत्रों मे बेरिकेडिंग कर या दीवार की बाउंड्री बना कर हाथियों की आवाजाही को रोका जा सकता है।उन्होंने कहा की हाथियों की आवाजाही उन क्षेत्रों मे अधिक बढी है।जो पिछले बीस से पच्चीस सालों मे तेजी से आवासीय क्षेत्र में जंगल से व नदियों के आसपास विकसित हुए है।वहां सुरक्षा के प्रबंध किये जाने की प्राथमिकता से आवश्यकता है।
उन्होंने कहा की हाथी प्रायः अपने समुहों मे 15 से 20 की संख्या में घुमते है।जिसमें युवा,प्रौढ़,बच्चों के समुह में नर व मादा हाथी शामिल रहते है। समुह में शामिल छोटे बच्चों की सुरक्षा को लेकर हाथी बहुत सजग रहते है। भोजन व पानी की तलाश मे यह समुह रुप मे प्रायः निकलते है। इनके समुह अपने क्षेत्र विशेष को छोड़कर दूसरे क्षेत्रों मे बहुत कम ही जाते है।
हरिद्वार व उसके आसपास के क्षेत्रों विशेषकर मोहंड,मोतीचूर,चीला,व कांगडी,लालढांग हाथी बाहुल्य क्षेत्र है।इन क्षेत्रों के जंगलों से लगे आसपास के क्षेत्रों में आवासीय बस्तियों के विकसित होने से इन क्षेत्रों मे अपनी पुरानी स्मृति होने के चलते हाथियों की आवाजाही लगातार वर्तमान समय में जारी है।
डा०जोशी का कहना है की वन क्षेत्रों के पास आवासीय क्षेत्र विकसित होने के चलते हरिद्वार देहरादून व ऋषिकेश रेल मार्ग पर हाथियों के मारे जाने की काफी घटनांए होती रही है। इन घटनाओं को रोकने के लिए सरकार द्वारा जो प्रयास किये जा रहे है।उनमे ओर अधिक व सजगता से कार्य किये जाने की आवश्यकता है।
वही दूसरी तरह तेंदुए की आवासीय क्षेत्र में बढती आवाजाही पर डा० जोशी का कहना है की पिछले कुछ समय मे हमारे यहां सुदूर क्षेत्रों मे वन व जंगलों का विस्तार हुआ है।जिसके चलते वनों में जानवरों की संख्या में बढोतरी हुयी है। प्रदेश मे तेंदुए का संरक्षण भी किया जा रहा है।ऐसे में तेंदुए अपने भोजन अन्य जानवरों जैसे हिरन,सुअर,कुत्ते जो आवासीय क्षेत्रों से सटे वनो में पाये जाते है की तलाश में तेजी से इन क्षेत्रों मे आ रहे है।
गढवाल की अपेक्षा कुमाऊं के जंगल अधिक घने बताते हुए डा० जोशी का कहना है की वह के जंगलों मे पानी के स्रोत अधिक है जिस कारण वहां जंगली जानवर जंगल से बाहर कम आते है।इसका कारण उन्हें जंगल में ही प्रचूर मात्रा में अपना भोजन ल पानी का मिलना तथा उनकी सुरक्षा है।वही तराई के क्षेत्रों में भी तेजी से जंगल कम हुए है।डा० जोशी ने सरकार से जंगल कोरीडोर विकसित किये जाने पर अधिक ध्यान दिये जाने पर कार्य किये जाने का आह्वान किया है।जिससे की जंगली जानवरों की आवाजाही को आवासीय क्षेत्रों में आने से रोका जा सके।



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