देहरादून, दून लाईब्रेरी एंड रिसर्च सेंटर की ओर से आज चार धाम यात्रा का बदलता पर्यटन स्वरुप विषय पर वरिष्ठ पत्रकार संदीप गुसाईं द्वारा सजीव छाया चित्र के माध्यम से एक व्याख्यान प्रस्तुत किया गया। जिसमें उन्होने ऋषिकेश से बदरीनाथ पैदल यात्रा मार्ग पर विस्तार से चर्चा की गई।
जब सडक मार्ग नही होते थे तो ऋषिकेश से आगे यात्रियों को पैदल ही सफर तय करना होता था।इस पैदल मार्ग में कई रात्रि विश्राम पडाव होते थे जिन्हें चट्टी कहा जाता था।गंगा घाटी में अब पैदल मार्ग में ये पडाव खंडहर बन चुके है।2023 में पत्रकार संदीप गुसाईं ने हरिद्वार से केदारनाथ धाम तक की यात्रा इन्ही चट्टियों के माध्यम से पूर्ण की।यात्रा मार्ग में अब केवल कुछ ही चट्टियों में दुकानें और धर्मशालाएं मौजूद है।ऋषिकेश से बदरीनाथ तक कुल 84 चट्टियां हुआ करती थी और पैदल मार्ग से यह दूरी करीब 1 माह में पूरी होती थी।
संदीप ने चिंता व्यक्त करते कहा आल वेदर रोड परियोजना और ऋषिकेश कर्णप्रयाग रेल प्रोजेक्ट के कारण इस पूरी गंगा घाटी पर भारी दबाव हो चुका है।तीर्थाटन परम्परा अब एक तरह से पर्यटन में तब्दील हो रही है।
ऋषिकेश-देवप्रयाग पैदल मार्ग के 67 किमी क्षेत्र में बडे होटल,रिजोर्ट और अत्यधिक पर्यटकों के दबाव से गंगा नदी और उसके पूरे ईकोसिस्टम पर बुरा प्रभाव पड रहा है।लेकिन पौड़ी गढवाल के क्षेत्र में अभी भी सन्नाटा पसरा है।पैदल मार्ग के रख रखाव और जीर्णोद्वार ना होने के कारण अब इस पैदल मार्ग पर केवल स्थानीय गांवों के लोग कुछ दूरियों तक सफर करते है।2013 की आपदा के बाद हेंवलघाटी,रुद्र गदेरा,महादेव चट्टी जैसे कई इलाकों में फ्लैश फ्लड और भूस्खलन ने भारी तबाही मचाई थी।ऋषिकेश कर्णप्रयाग रेल प्रोजेक्ट के बाद इस घाटी के कई गांवों के मकानों में दरारें पडती जा रही है।देवप्रयाग के पास सौड़ गांव में लगभग सभी मकानों में दरारें है।कई प्राकृतिक जलस्रोत सूख चुके है।
उन्होंने आगे कहा कि आज से 100 साल पहले ऋषिकेश से देवप्रयाग तक पैदल सफर कर यात्री जाते थे।ऋषिकेश में टिहरी राजा की तरफ से कुली एजेंसी थी जबकि लक्ष्मणझूला के पास ब्रिटिश सरकार ने कुली एजेंसी,पुलिस चौकी,डिस्पेंसरी और पोस्ट आफिस बनाए थे।
लक्ष्णण झूला से यात्री फूलचट्टी,मोहनचट्टी,बिजनी चट्टी होते हुए नौडखाल धार पार कर बंदरचट्टी पहुचते थे।बंदरचट्टी के बाद महादेव चट्टी से तोता घाटी होते हुए कांडी चट्टी पहुचते थे।कांडी चट्टी में डिस्पेंसरी,कुली एजेंसी,पोस्ट आफिस और धर्मशाला हुआ करती थी जो आज भी मौजूद है।यहां पर करीब 14 दुकानें थी जिनसे यात्री खाने पीने का सामान लिया करते।कांडी चट्टी के बाद व्सास चट्टी में काली कमली की धर्मशाला और दुकाने थी।आज ये धर्मशाला पूरी तरह से खंडहर हो चुकी है।व्यास चट्टी में नयार नदी जिसे पूराणों में नवालिका कहा गया है वो आकर मिलती है।इसे इंद्रप्रयाग भी कहते है।व्यास चट्टी में गंगा नदी ऊ की आकृति बनाती है।व्यासघाट चट्टी से आगे करीब 12 किमी पर इस यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल देवप्रयाग आता है जिसे बाह बाजार भी कहते है।बाह बाजार में कई दुकानें और धर्मशालाएं यात्रियों के लिए हुआ करती थी।आज भी यहां पर काली कमली की धर्मशालाएं हैं।
संदीप ने यह भी बताया कि चार धाम यात्रा में जब 1880 में हरिद्वार तक ट्रैन पहुंची तो देश भर से तीर्थयात्रियों की संख्या में तेजी आने लगी।उसी दौरान स्वामी विशुद्वानंद चार धाम की पैदल यात्रा पर आए।यात्रियों के दुखों और उच्च हिमालयी में उनके लिए रात्रि विश्राम स्थलों धर्मशालाओं का बेहद अभाव था।उस दौरान बहुत कम धर्मशालाएं और गेस्ट हाऊस हुआ करते थे।विशुद्दानंद महाराज जिन्हे काली कमली वाले बाबा कहते है उन्होंने यात्रियों के कष्टों को देखते हुए अपने अनुयाईयों से पूरे चार धाम यात्रा मार्ग पर 100 से अधिक धर्मशालाएं बनवाई।ब्रिटिश काल में पैदल रास्तों,छोटी पुलिया और झूलों पूलों के निर्माण में तेजी आई।ब्रिटिश सरकार ने सदावर्त के फंड से यात्रा मार्ग में डिस्पेंसरी भी खुली जहां यात्रियो को निशुल्क दवाईयां मिलती थी।
ऋषिकेश से देवप्रयाग तक पूरा पैदल मार्ग वर्तमान पौडी गढवाल के यमकेश्वर और द्वारीखाल विकासखंडों से होकर देवप्रयाग तक पहुचता है।यह मार्ग बेहद कठिन भी है क्योंकि मार्ग में जंगली जानवरों का आतंक बहुत रहता था।
शिवालिक और मध्य हिमालय का यह क्षेत्र आपदाओं की दृष्टि से बेहद संवेदशील है।कई गाड गदेरों और गंगा नदी के तेज बहाव से यात्रा मार्ग बाधित हो रहता था।हेंवल नदी,रुद्र गदेरा,नयार नदी सहित दर्जनों छोटे बडे नदी नालों को पार कर यात्री देवप्रयाग पहुचते थे।यात्रा देवप्रयाग से गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ और बदरीनाथ के लिए जाते थे।वर्तमान समय में सडक,हेली से यात्रा संचालित हो रही है।ऋषिकेश-देवप्रयाग मार्ग में राफ्टिंग,कैम्पिंग और अन्य एडवेंचर स्पोर्ट्स के कारण पूरे चार धाम यात्रा में सबसे ज्यादा भीड होती है।इससे ना सिर्फ सालिड वेस्ट मैनेजमेंट की समस्या खडी हो गई है बल्कि राजाजी नेशनल पार्क और नरेन्द्र नगर वन प्रभाग से जुडे जंगलों में वन्यजीव पर प्रतिकूल असर पड रहा है।भारतीय वन्य जीव संस्थान ने कई बार इसकी चेतावनी भी जारी की है।लगातार बढता पर्यटन तीर्थाटन को खत्म कर रहा है।सडकों पर दबाव और भूस्खलन के कई नये क्षेत्र अब . विकसित होते जा रहे है।
संदीप गुसाईं पौड़ी गढ़वाल जिले में एकेश्वर विकासखंड के नावा गाँव के मूल रहने वाले है। इन्होने M.A मास कम्युनिकेशन की पढ़ाई गढ़वाल विवि से की। 2007 से 2011 तक ETV में संवाददाता रहे। उसके बाद साधना न्यूज़ और फिर Zee न्यूज़ में कार्य करते हुए 2020 में नई मीडिया का माध्यम चुना।2020 से rural tales चैनल के माध्यम से करीब 800 गाँवों की पद यात्राएँ कर चुके है। 2023 में उन्होंने हरिद्वार से केदारनाथ पुराने पैदल मार्ग की कवरेज करते हुए पुराने चार धाम यात्रा मार्ग की लम्बी सीरीज की आज की प्रस्तुति ऋषिकेश से देवप्रयाग के बीच गंगा घाटी में विभिन्न चुनौतियों पर केन्द्रित रही।
छाया चित्र व्याख्यान कार्यक्रम चन्द्रशेखर तिवारी, कल्याण सिंह रावत, रेखा उनियाल धस्माना, कल्याण बुटोला, देवेन्द्र कुमार, राजू गुंसाई, सुरेन्द्र सजवाण,डॉ.डी.के. पाण्डे, डा. योगेश धस्माना, डॉ.लालता प्रसाद, आलो क सरीन, चंदन नेगी, सुंदर बिष्ट, कर्नल कण्डवाल, डॉ. अतुल शर्मा, प्रेम पंचोली, सहित कई साहित्यकार,इतिहासकार,छात्र – छात्राएं और तमाम मीडियाकर्मी उपस्थित थे।



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