आख़िर मैं हूँ क्या….?
(डॉ. रक्षा रतूड़ी)
मैं पैशे से चिकित्सक हूँ,
महीने के अंत में मुझे वेतन मिलता है।
अगर मैं चिकित्सक न होती,
तो अधिवक्ता होती,
डी.एम. होती,
राजनेता होती।
और अगर कुछ न होती,
तो गृहिणी अवश्य होती।
गृहिणी होकर भी,
मैं घर का पूरा खर्च बचा लेती,
मतलब मैं भी कमा रही होती।
इस दृष्टि से देखूँ तो
मैं वैश्य भी हूँ।
मुझे हिंदी आती है,
संस्कृत भी जानती हूँ,
अंग्रेज़ी समझ लेती हूँ।
क्षेत्रीय भाषाओं पर भी मेरा अधिकार है।
मैं दुनिया को उपदेश भी दे सकती हूँ,
और अपने बच्चे को भला-बुरा भी बताती हूँ।
इस दृष्टि से मैं ब्राह्मण भी हूँ।
मैं अपने देश से प्यार करती हूँ,
अपने देश पर मर मिटने को तैयार हूँ।
और यदि ज़रूरत पड़ी तो
हथियार भी उठा लूँगी।
इस दृष्टि से मैं क्षत्रिय भी हूँ।
जब मुझे छुट्टी मिलती है,
तो मैं घर का सारा काम करती हूँ।
झाड़ू-पोंछा, बर्तन,
वॉशरूम-टॉयलेट तक साफ़ करती हूँ।
कभी-कभी अपने जूते-चप्पल की
छोटी-मोटी सिलाई भी कर लेती हूँ।
इस दृष्टि से मैं शूद्र भी हूँ।
मैं छोटी-छोटी बातों पर भावुक हो जाती हूँ,
कभी हँसती, कभी रो लेती हूँ।
इस दृष्टि से मैं माँ (महिला )भी हूँ।
मैं अपने परिवार को बचाने के लिए,
हर संभव प्रयास करती हूँ,
हर कठिनाई का सामना करती हूँ।
इस दृष्टि से मैं पिता (पुरुष )भी हूँ।
अब मैं सोचती हूँ—
आख़िर मैं हूँ क्या?
ब्राह्मण हूँ?
क्षत्रिय हूँ?
वैश्य हूँ?
शूद्र हूँ?
महिला हूँ?
पुरुष हूँ?
या फिर…
मैं सब कुछ हूँ,
या थोड़ा-थोड़ा सब कुछ हूँ।
मेरी पहचान क्या है?
लेकिन सच तो यह है
कि मैं कुछ भी नहीं,
मैं जाति, संप्रदाय, लिंग से हटकर सिर्फ़ एक इंसान हूँ।
और इंसानियत ही मेरी पहचान भी है
और आप सब भी—
सिर्फ़ इंसान ही हैं।
और इंसानियत ही पहचान है, सबकी….

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