- -समय की पाबंदी, सीधे शब्दों में बात करना और काम को लेकर कठोरता ये सब उनके स्वभाव का हिस्सा थे
– इसी कठोरता के भीतर एक ऐसी संवेदनशीलता भी थी जो पहाड़ के आदमी की तकलीफ समझती थी।
देहरादून उत्तराखंड की राजनीति में कई चेहरे आए, कई गए, लेकिन भुवन चंद्र खंडूरी उन दुर्लभ नेताओं में रहे जिनके बारे में लोग कहते थे “ये नेता कम, फौजी ज़्यादा लगते हैं।”
उनका निधन केवल एक राजनेता का जाना नहीं है, बल्कि उस दौर का अंत है जिसमें ईमानदारी को “राजनीतिक कमजोरी” नहीं, बल्कि “व्यक्तित्व की ताकत” माना जाता था।
मुख्यमंत्री बनने के बाद भी फौजी आदत नहीं गई :
कहा जाता है कि खंडूरी साहब समय को लेकर इतने सख्त थे कि मीटिंग में देर से आने वाले अफसर भी असहज हो जाते थे। उनके साथ काम कर चुके लोग बताते हैं कि वे बैठकों में पूरी तैयारी के साथ पहुँचते थे और छोटी प्रशासनिक बातों को भी गंभीरता से लेते थे। उनके व्यक्तित्व में सेना की छाप अंत तक बनी रही।
समय की पाबंदी, सीधे शब्दों में बात करना और काम को लेकर कठोरता ये सब उनके स्वभाव का हिस्सा थे। लेकिन इसी कठोरता के भीतर एक ऐसी संवेदनशीलता भी थी जो पहाड़ के आदमी की तकलीफ समझती थी।
राजनीति में अक्सर लोग सबको खुश रखने की कोशिश करते हैं, लेकिन खंडूरी साहब का स्वभाव अलग माना जाता था। वे अपने करीबी लोगों की सिफारिशों पर भी हर बार सहमत नहीं होते थे। यही कारण था कि कुछ लोग उन्हें सख्त प्रशासक मानते थे।
उत्तराखंड बनने के बाद राज्य ने कई राजनीतिक चेहरे देखे, लेकिन खंडूरी की छवि अलग बनी।
लोग उन्हें “राजनेता” कम और “अनुशासित प्रशासक” अधिक मानते थे। शायद इसकी वजह उनका सैन्य जीवन था, जिसने उनके व्यक्तित्व को भीतर तक गढ़ दिया था।
वे पहाड़ की “खामोशी” जैसे नेता थे:
आज की राजनीति में भाषण, कैमरा और सोशल मीडिया बहुत महत्वपूर्ण हो चुके हैं। लेकिन खंडूरी उस पीढ़ी के नेता थे जिन्हें प्रचार से अधिक काम पर भरोसा था। वे कम बोलते थे, लेकिन जब बोलते थे तो बात सीधी और स्पष्ट होती थी।
वे भीड़ को प्रभावित करने वाले नेता नहीं थे। वे धीरे-धीरे विश्वास पैदा करने वाले व्यक्ति थे।
उनकी भाषा में आक्रामकता कम और जिम्मेदारी अधिक दिखाई देती थी। आज जब राजनीति का बड़ा हिस्सा शोर में बदल चुका है, खंडूरी उस दौर की याद दिलाते हैं जहाँ चरित्र भी किसी नेता की पहचान हुआ करता था।
सेना का असर राजनीति में भी दिखता था:
बहुत कम लोग जानते हैं कि सेना की पृष्ठभूमि ने उनके प्रशासनिक फैसलों को गहराई से प्रभावित किया। वे काम को केवल औपचारिक प्रक्रिया की तरह नहीं देखते थे, बल्कि परिणाम तक पहुँचाने की कोशिश करते थे।
कई अधिकारियों का मानना था कि वे फाइलों को बहुत ध्यान से पढ़ते थे और छोटी तकनीकी बातों पर भी नजर रखते थे। यही वजह थी कि नौकरशाही उनके सामने पूरी तैयारी के साथ बैठना पसंद करती थी।
पहाड़ से उनका रिश्ता केवल राजनीति नहीं था:
उत्तराखंड के दूरस्थ इलाकों की यात्राओं के दौरान वे अक्सर औपचारिकता छोड़कर स्थानीय लोगों से सीधे बात करने लगते थे। उन्हें यह एहसास था कि पहाड़ में रहने वाला व्यक्ति केवल विकास के आंकड़े नहीं, बल्कि सड़क, अस्पताल और रोज़गार जैसी बुनियादी उम्मीदों के सहारे जीवन काटता है। वे उन नेताओं में नहीं थे जिन्हें पहाड़ केवल चुनावी मंच की तरह दिखाई दे।
उन्होंने पहाड़ की कठिनाई, पलायन और लोगों की चुप तकलीफों को करीब से महसूस किया था।
“ईमानदार लेकिन कड़क” नेता की छवि:
दिलचस्प बात यह है कि जनता उन्हें बेहद ईमानदार मानती थी, लेकिन राजनीति के भीतर कई लोग उन्हें “बहुत कड़क” स्वभाव का नेता मानते थे। क्योंकि वे समझौते कम करते थे।
उनकी राजनीति का सबसे अलग पक्ष शायद यही था कि वे लोकप्रिय दिखने से अधिक भरोसेमंद दिखना चाहते थे।
आज की राजनीति में जहाँ हर बात कैमरे के लिए कही जाती है, खंडूरी उस पीढ़ी के व्यक्ति थे जिन्हें कैमरे से अधिक व्यवस्था की चिंता थी। वे कम बोलते थे, लेकिन उनकी चुप्पी भी कई बार बयान से अधिक असर छोड़ जाती थी।
वे सत्ता को “विशेषाधिकार” नहीं, “कर्तव्य” मानते थे।
उनके चेहरे पर हमेशा एक सैन्य अधिकारी जैसी गंभीरता दिखाई देती थी। वे उन नेताओं में नहीं थे जो हर समय कैमरों के बीच बने रहना चाहते हों। सार्वजनिक जीवन में सादगी उनकी पहचान रही। उनके आलोचक भी उनकी ईमानदारी पर बहुत कम सवाल उठा पाए। यह अपने आप में बड़ी बात है, क्योंकि राजनीति में लंबे समय तक सक्रिय रहने के बाद भी साफ छवि बचाकर रखना आसान नहीं होता।
अंत में…
भुवन चंद्र खंडूरी केवल एक पूर्व मुख्यमंत्री नहीं थे।
वे उस सोच का प्रतिनिधित्व करते थे जिसमें सार्वजनिक जीवन को “सेवा” कहना केवल भाषण की पंक्ति नहीं, बल्कि व्यक्तिगत अनुशासन का हिस्सा होता था।
भुवन चंद्र खंडूरी का जीवन हमें यह याद दिलाता है कि राजनीति में शोर से अधिक महत्व चरित्र का होता है।
वे पहाड़ की उस पुरानी पीढ़ी के प्रतिनिधि थे जो कम बोलती थी, लेकिन अपने पीछे भरोसे की छाप छोड़ जाती थी।
आज जब उत्तराखंड उन्हें विदाई दे रहा है, तब पहाड़ शायद अपने एक ऐसे चेहरे को खो रहा है जो शोर नहीं करता था, लेकिन भरोसा देता था। एक ऐसा आदमी, जो राजनीति में रहकर भी पूरी तरह राजनीतिक नहीं हुआ।
-“ऐसे अनुशासित और सादगीपूर्ण जननायक को विनम्र श्रद्धांजलि।”


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