(एल मोहन लखेड़ा)
देहरादून, पहाड़ के गाँवों से युवाओं का पलायन आज एक गंभीर चुनौती है, लेकिन पहाड़ की तस्वीर केवल पलायन और बेरोजगारी की नहीं है। अनेक युवा ऐसे भी हैं, जो नई सोच, तकनीक और उद्यमिता के सहारे अपने गाँवों में लौटकर न केवल स्वयं के लिए रोजगार के अवसर पैदा कर रहे हैं, बल्कि दूसरे लोगों को भी रोजगार उपलब्ध करा रहे हैं। यदि पहाड़ के युवाओं को स्थानीय संसाधनों, आधुनिक तकनीक और बाजार से जोड़ दिया जाए तो रोजगार के लिए होने वाले पलायन की दिशा को काफी हद तक बदला जा सकता है।
यह बात वरिष्ठ सामाजिक चिंतक और लेखक विजेन्द्र रावत ने सोमवार को दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र में युवा पाठकों के साथ आयोजित ‘युवा संवाद कार्यशाला : पहाड़ होगा, आने वाला कल’ में कही।
दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र की ओर से आयोजित इस सार्थक संवाद का विषय ‘पर्वतीय कृषि, बागवानी, पर्यटन और पर्यावरण के क्षेत्र में सम्भावित उद्यमिता के अवसर’ था। कार्यशाला में युवाओं के साथ सीधे संवाद करते हुए श्री रावत ने कहा कि रोजगार का अर्थ केवल सरकारी नौकरी प्राप्त करना नहीं है। पहाड़ में उपलब्ध जमीन, जल, जंगल, कृषि, बागवानी, पशुपालन, पर्यटन और स्थानीय ज्ञान को आधुनिक तकनीक तथा बाजार से जोड़कर रोजगार के अनेक अवसर पैदा किए जा सकते हैं।
विजेन्द्र रावत ने अपने विचार में मत व्यक्त किया और कहा कि आज भले ही पहाड़ के अनेक गाँव पलायन की गिरफ्त में हैं और रोजगार तथा बेहतर अवसरों की तलाश में युवा शहरों की ओर जा रहे हैं, लेकिन दूसरी ओर कुछ युवा नई उम्मीदों और नए विचारों के साथ अपने गाँवों की ओर लौट भी रहे हैं। वे ईमानदारी, मेहनत और तकनीक के सहारे अपने लिए रोजगार खड़ा कर रहे हैं और अपने साथ-साथ गाँव के अन्य लोगों के लिए भी आजीविका के अवसर पैदा कर रहे हैं। यही प्रयास इस विश्वास को मजबूत करता है कि ‘आने वाला कल पहाड़ का हो सकता है।’
रावत ने उदाहरण देकर युवाओं से कहा कि देश के विभिन्न हिस्सों में काम करने और अलग-अलग क्षेत्रों का अनुभव प्राप्त करने के बाद अनेक लोग पहाड़ की ओर लौटकर स्वरोजगार और उद्यमिता के नए रास्ते तलाश रहे हैं। ऐसे लोगों के अनुभव युवाओं के लिए प्रेरणा के साथ-साथ व्यावहारिक मार्गदर्शन भी हैं। उन्होंने चकराता के विक्रम पंवार जैसे युवाओं का उदाहरण देते हुए बताया कि किस तरह युवा बाहर रोजगार के अवसर मिलने के बावजूद अपने गाँव में लौटकर पर्यटन, खानपान और अन्य व्यवसायों के माध्यम से अपने लिए तथा दूसरे लोगों के लिए रोजगार पैदा कर सकते हैं।
उन्होंने जोर देकर कहा कि पहाड़ में कृषि और बागवानी को केवल परंपरागत खेती के रूप में देखने के बजाय इसे बाजार आधारित उद्यम के रूप में विकसित करने की आवश्यकता है। फल-सब्जी उत्पादन, जैविक खेती, प्रसंस्करण, डेयरी, पशुपालन, स्थानीय खाद्य उत्पाद, कुटीर एवं लघु उद्योग, होम-स्टे, ग्रामीण पर्यटन और प्रकृति आधारित पर्यटन में व्यापक संभावनाएँ हैं। पर्यावरण संरक्षण को भी रोजगार और उद्यमिता से जोड़ा जा सकता है। युवाओं को अपने स्थानीय संसाधनों की पहचान कर उन्हें मूल्यवर्धित उत्पाद और सेवाओं में बदलने की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।
अहमदाबाद भारतीय प्रबन्ध संस्थान से प्रबंधन की उच्च शिक्षा प्राप्त कर चुके कनासर के सेब की बागवानी को सफलता के शिखर पर ले जाने वाले युवा उद्यमी विक्रम पंवार ने युवाओं से कहा कि छोटे स्तर से शुरू किया गया कोई भी काम यदि सही योजना, मेहनत, तकनीक और बाजार की समझ के साथ किया जाए तो वह आगे चलकर अच्छी आय का माध्यम बन सकता है। उन्होंने कहा कि कई स्वरोजगार ऐसे हैं जिन्हें सीमित पूँजी से शुरू किया जा सकता है और धीरे-धीरे उनका विस्तार किया जा सकता है। इसलिए सरकारी नौकरी न मिलने को जीवन की असफलता मानकर निराश होने के बजाय युवाओं को उपलब्ध विकल्पों पर विचार करना चाहिए।
बागवानी के सफल उद्यमी लांघा रोड के इन्द्रसिंह नेगी ने कहा कि पहाड़ के गाँवों को केवल रहने की जगह नहीं, बल्कि रोजगार, उद्यम और संभावनाओं के केन्द्र के रूप में विकसित करने की जरूरत है। इसके लिए युवाओं को स्थानीय संसाधनों, आधुनिक तकनीक, डिजिटल माध्यमों और बाजार की नई आवश्यकताओं के साथ जोड़ना होगा। उन्होंने युवाओं से अपने गाँवों में उपलब्ध अवसरों को पहचानने, नए प्रयोग करने और सामूहिक रूप से आगे बढ़ने का आह्वान किया।
कार्यक्रम का संचालन युवा पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता प्रेम पंचोली ने किया। युवा प्रतिनिधियों राधा पुण्डीर और राघव उनियाल ने भी संवाद में भाग लेते हुए युवाओं की आकांक्षाओं, रोजगार की चुनौतियों तथा पहाड़ में उपलब्ध अवसरों से जुड़े सवाल और विचार सामने रखे। संवाद के दौरान युवाओं ने कृषि, पर्यटन, स्वरोजगार, स्थानीय उत्पादों के विपणन तथा पहाड़ में रहकर आजीविका के अवसर विकसित करने से जुड़े विषयों पर अपनी बात भी रखी।
कार्यक्रम की शुरुआत में दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र के कार्यक्रम अधिकारी चन्द्रशेखर तिवारी ने अतिथि वक्ताओं, पहाड़ में आजीविका के साधन विकसित करने वाले रोल मॉडल्स तथा प्रतिभागी युवा पाठकों का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि दून पुस्तकालय केवल पुस्तकों और पठन-पाठन तक सीमित न रहकर यहां अध्ययनरत युवाओं को समकालीन सामाजिक, आर्थिक और रोजगार संबंधी मुद्दों से जोड़ने का भी प्रयास कर रहा है। उन्होंने बताया कि पुस्तकालय की ओर से इस तरह के संवादों के माध्यम से पहाड़ के युवाओं को उद्यमिता और स्थानीय स्तर पर रोजगार के विकल्पों की दिशा में प्रेरित करने का प्रयास आगे भी जारी रहेगा।
कार्यक्रम के दौरान प्रतिभागी छात्रों को विजेन्द्र रावत की पुस्तक ‘हमारे नायक’ की प्रतियाँ निःशुल्क भेंट की गईं। इस पुस्तक में युवाओं को समाज में सकारात्मक बदलाव लाने के प्रयासों से परिचित कराने का प्रयास किया गया है।
कार्यशाला में हुई बातचीत और सवाल -जबाब का निष्कर्ष यही रहा कि पहाड़ का भविष्य केवल सरकारी योजनाओं से नहीं, बल्कि स्थानीय समाज, युवाओं की रचनात्मक ऊर्जा और स्थानीय संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग से बन सकता है। युवा यदि जागरूक होकर अपने गाँवों की तरफ देखे और वहां उपलब्ध संभावनाओं को पहचानकर उन्हें आधुनिक तकनीक और बाजार से जोड़ें तो रोजगार की तलाश में होने वाला पलायन को कुछ हद तक रोका जा सकता है ।इस तरह के प्रयासों से गाँवों में नई आर्थिक गतिविधियों को जन्म दिया जा सकता है। निश्चित तौर पर ‘पहाड़ होगा, आने वाला कल’ का यह विश्वास तभी साकार होगा, जब पहाड़ का युवा अपने भविष्य को अपने गाँव और अपनी धरती से जोड़ने की ओर उन्मुख होने का प्रयास करेगा।
इस अवसर पर दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र के पुस्तकालयाध्यक्ष डी.के. पाण्डे ने धन्यवाद दिया और इस तरह के कार्यक्रमों से युवाओं को उद्यमिता की दिशा में जुड़ने का आह्वान किया ।
कार्यक्रम में रविंद्र जुगरान, जगदम्बा मैठाणी, बी.एस. नेगी, आलोक सरीन पंडित राजेन्द्र सेमवाल, उत्तरांचल प्रेस क्लब के अजय राणा, डॉ. लालता प्रसाद, सुंदर सिंह बिष्ट सहित दून पुस्तकालय में अध्ययनरत कई युवा पाठक उपस्थित रहे।


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