Thursday, June 4, 2026
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सरकारों के भरोसे प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण नहीं हो सकता : राजेंद्र सिंह

देहरादून (एल मोहन लखेड़ा), उत्तराखंड़ जल बिरादरी द्वारा आयोजित “हिमालय आपदा – गंगा और यमुना का विकास या विनाश पर दून पुस्तकालय में हुई एक दिवसीय बैठक में वक्ताओं ने कहा कि मौजूदा हालात को बनाने में मौजूदा नीतियां ही जिम्मेदार है। इसलिए कि हिमालय क्षेत्र में सड़कों की चौड़ाई 5 – 6 मीटर से अधिक नहीं होनी होनी चाहिए।
बैठक में विषय वस्तु को आरंभ करते हुए पर्यावरणविद सुरेश भाई ने कहा कि इस वक्त की आपदा मानवजनित है। उन्होंने कहा कि हिमालय में चौड़ी सड़कों की आवश्यकता नहीं है। जब से उत्तराखंड, हिमाचल में चौड़ी सड़के और बांध बनने आरंभ हुए है तब से उत्तराखंड आपदा का घर बन गया है।
बैठक में पहुंचे मैग्सेसे पुरस्कार विजेता जल पुरुष राजेंद्र सिंह ने कहा कि आज जो हिमालय में आपदा ने घाव दिए है उसके जिम्मेदार भी हम ही लोग है। राजेंद्र सिंह ने आगे कहा कि आज नदियों की आजादी, हिमालय की हरियाली दोनों ही विपदा से गुजर रही है। उन्होंने कहा कि हम हिंदुस्तान वालों को कम से कम “भगवान” शब्द को समझना होगा। हमारे पूर्वजों ने भगवान को प्रकृति से जोड़ा है। इसलिए हम लोग पंचभूत को मानते है। अर्थात हमें प्रकृति और प्रकृति हमारे लिए जैसी व्यवस्था को हमे पुनः बहाल करनी होगी।
इस मौके पर जल पुरुष राजेंद्र सिंह ने वर्तमान की व्यवस्था पर आरोप लगाया कि आज का विकास सिर्फ वी सिर्फ एक लॉलीपॉप है। उन्होंने 1988 में अरावली की पहाड़ियों में लोगों द्वारा जल संरक्षण के कार्यो की तरह इस वक्त हिमालय वासियों को भी करना होगा। सरकारों के भरोसे प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण नहीं हो सकता। लोक सहभागिता से ही प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण और आपदा से बचाव के कार्य हो सकते है।
पद्मश्री कल्याण सिंह रावत ने कहा कि पानी के टावर हिमालय पर खतरनाक संकट आ चुका है। ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे है। हमने प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण की लोक परंपरा भुला दी है। विभिन्न योजनाओं के मार्फत भारी मात्रा में पौधा रोपण हो रहा है, जो बिना प्रयोजन के हो रहा है। उन्होंने कहा कि प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के लिए जितनी भी योजनाएं या कार्य हो रहे है वे सभी अनियोजित तरीके से क्रियान्वित हो रही हैं।
पर्यावरण के जानकार प्रो० वीरेंद्र पैन्यूली ने सरकार के इस बयान पर गौर करना होगा कि दिल्ली में 10 प्रतिशत मूल यमुना जल है तो 90 प्रतिशत जल क्या है। इसलिए सरकार के कारण ही इस तरह की अनियोजित विकास की योजनाओं को अंजाम दिया जा रहा है, जिसका परिणाम आपदा के रूप में सामने आ रहा है। पूर्व राज्य मंत्री रविंद्र जुगरान ने कहा कि हिमालय विकास के लिए अलग से मंत्रालय का गठन हो ताकि हिमालय के विकास के कार्य लोकहित में हो सके।
मात्री सदन के स्वामी शिवानंद ने कहा कि उत्तराखंड की सरकार विकास के प्रति संवेदनशील नहीं है। गंगा संरक्षण के लिए दो सनातनी गुरुओं ने आहुति दी है। मगर सरकार ने कभी उनकी और अन्य धर्म गुरुओं की मांग पर गौर नहीं किया। कई साधु संत गंगा संरक्षण के लिए आंदोलित है पर सरकार कभी उनकी चिंता नहीं समझती है।
दिल्ली जल बिरादरी के संजय सिंह ने कहा कि जितने भी लोग और संगठन आपदा राहत और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के लिए कार्य कर रहे है, उन्हें एक श्वेत पत्र जारी करना होगा। ताकि भविष्य के लिए कुछ कार्य किए जा सके।
बैठक में जन कवि अतुल शर्मा ने एक बार फिर से संभावनाएं बढ़ा दी है। उन्होंने अपने एक गीत “अब नदियों पर संकट है सारे गांव इकट्ठा हो” गया और कहा कि अब विकास को लेकर सभी को उत्तराखंड आंदोलन की तरह इक्कठा होना होगा, हरियाणा से आए संजय राणा ने कहा कि इस वर्ष यमुना ने 10 हजार बीघा जमीन लील ली है। यानी 5 किमी वर्ग क्षेत्रफल को डूबो दिया है।
भू वैज्ञानिक प्रो० एस० पी० सती ने चिंता व्यक्त की है आज का युवा दिग्भ्रमित हो गया है। इसका कारण भी सरकारें ही है। उन्होंने कहा कि मरुस्थल में बारिश हो रही है और हिमालय में अनियंत्रित बारिश हो रही है। यही बदलाव जो आया है उसके कारण आपदाएं आ रही है।
इतिहासकार डॉ० योगेश धस्माना ने कहा कि उत्तराखंड हिमालय सबसे पहले केयरिंग कैपिसिटी पर नीति बनानी होगी। वरिष्ठ पत्रकार विजेंद्र सिंह रावत ने कहा कि हिमालय में बढ़ती आपदा को लेकर हिमालय के युवाओं को “हिमालय प्रहरी या सीमांत प्रहरी” के रूप में प्रशिक्षित किया जाए। इसलिए कि वे वहां के हालात और पर्यावरण को अच्छी तरह समझ सकते है।
इस दौरान पद्मश्री कल्याण सिंह रावत, उत्तरप्रदेश से आए पर्यावरण कार्यकर्ता संजय राणा, स्तंभकार प्रो० वीरेंद्र पैन्यूली, जनकवि अतुल शर्मा, सर्वोदय कार्यकर्ता रमेश शर्मा, नागरिक मंच के सुभाष नौटियाल, राजस्थान जल बिरादरी के संजय भाई, हिमालय बचाओ आंदोलन के समीर रतूड़ी, ख्यातिलब्ध लोक कलाकार नंदलाल भारती, डा० आशालाल, सर्वोदय नेत्री कुसुम रावत, पर्यावरण कार्यकर्ता श्यामलाल, लोक कलाकार कुंदन सिंह चौहान, सामाजिक कार्यकर्ता शैलेन्द्र डेविड आदि लोगो ने अपनी अपनी बात रखी।

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