Sunday, April 19, 2026
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देहरादून में देवकीनंदन ठाकुर की कथा का समापन, सामूहिक हनुमान चालीसा के पाठ से गूंज उठा कथा पंडाल, उमड़ी भक्तों की भारी भीड़

बच्चों को मोबाइल से दूर कर सत्संग से जोड़ें, कथा में दिया गया बेहतर भविष्य का मंत्र

देहरादून देहरादून में पूज्य श्री देवकीनंदन ठाकुर जी महाराज के सानिध्य में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा का समापन हो गया। इस अवसर पर कथा में हनुमान जी के प्राकटोत्सव के पावन अवसर पर सामूहिक हनुमान चालीसा का पाठ किया गया । इस दिव्य क्षण में कथा पंडाल भक्ति और श्रद्धा से गूंज उठा। सभी भक्तों ने एक स्वर में हनुमान जी का स्मरण करते हुए हनुमान चालीसा का पाठ किया, जिससे संपूर्ण कथा पंडाल आध्यात्मिक और सकारात्मक ऊर्जा से भर गया। यह दृश्य अत्यंत मनोहारी और भावविभोर करने वाला था।

गौ माता सर्वदेवमयी है, अर्थात उनमें सभी देवी-देवताओं का वास माना जाता है। जब हम उन्हें पहली रोटी देते हैं, तो यह एक प्रकार से सभी देवताओं को अर्पण करने के समान होता है। इससे हमारे जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और हमारे कर्म शुद्ध होते हैं। जो व्यक्ति नियमित रूप से गौ माता की सेवा करता है, उसके जीवन में आने वाली बाधाएं धीरे-धीरे समाप्त हो जाती हैं, परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है और आर्थिक स्थिति में भी सुधार होता है।

भगवान कृष्ण जी ने रण धर्म की रक्षा और ब्राह्मणों की रक्षा के लिए छोड़ा था, न कि भय के कारण। यह उनका कायरता नहीं, बल्कि करुणा, धर्म और लोक-कल्याण से प्रेरित दिव्य निर्णय था। भगवान का प्रत्येक कदम धर्म की रक्षा के लिए उठता है। भगवान का हर कार्य केवल लीला नहीं, बल्कि धर्म की स्थापना और संसार के कल्याण के लिए होता है। भगवान कृष्ण की हर लीला हमें यह संदेश देती है कि धर्म की स्थापना के लिए कभी-कभी पीछे हटना भी आवश्यक होता है, और वही सच्ची विजय का मार्ग बनता है।

जब-जब धरती पर धर्म की हानि होती है और अधर्म बढ़ता है, तब भगवान किसी न किसी रूप में अवतार लेते हैं। चाहे वह भगवान श्रीकृष्ण का बाल रूप हो, जिसमें उन्होंने अधर्म का अंत किया, या भगवान श्रीराम, जिन्होंने रावण जैसे अधर्मी को पराजित कर धर्म की स्थापना की। जब भी जीवन में कठिनाइयाँ बढ़ती हैं और अन्याय हावी होता है, तब सत्य और धर्म अंततः विजय प्राप्त करते हैं। भगवान का हर अवतार हमें यह विश्वास दिलाता है कि धर्म कभी नष्ट नहीं होता, वह समय-समय पर पुनः स्थापित होता है।

मित्रता करनी हो तो श्रीकृष्ण और सुदामा जैसी करनी चाहिए। सच्चा मित्र वही होता है, जो अपने मित्र की पीड़ा को बिना कहे समझ जाए और समय आने पर निस्वार्थ भाव से उसकी सहायता करे। ऐसी मित्रता में न कोई दिखावा होता है, न कोई स्वार्थ—केवल प्रेम, विश्वास और समर्पण होता है। भगवान श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता हमें यह सिखाती है कि सच्ची दोस्ती धन, पद या स्थिति पर निर्भर नहीं करती, बल्कि दिल के सच्चे भावों पर टिकी होती है। सुदामा निर्धन थे, लेकिन श्रीकृष्ण ने कभी उनकी गरीबी को नहीं देखा, बल्कि उनकी भावनाओं को महत्व दिया।

सबसे बड़ा धर्म है सत्य बोलना। सत्य ही धर्म का मूल है। जो व्यक्ति सच्चाई के मार्ग पर चलता है, वह कभी हारता नहीं। भले ही समय कठिन हो, परंतु अंततः सत्य की ही विजय होती है। इसलिए हमें सदैव सच बोलने का प्रयास करना चाहिए, चाहे परिस्थिति जैसी भी हो। सत्य का मार्ग कठिन अवश्य होता है, लेकिन यही मार्ग मनुष्य को आत्मिक शांति और सम्मान दिलाता है। इतिहास और शास्त्र भी इस बात के साक्षी हैं कि जिन्होंने सत्य को अपनाया, अंत में वही विजयी हुए श्रीमद्भागवत कथा का भव्य आयोजन का संचालन एवं व्यवस्थापन सीमा शर्मा सुनील शर्मा संदीप रस्तोगी एवं शिल्प रास्तों के द्वारा किया जा रहा है उन्होंने कहा कि अधिक से अधिक संख्या में तथा में लोग पहुंच रहे हैं

बच्चों को बचपन से नित्य सत्संग सुनवाना चाहिए, जिससे उनमें बचपन से ही अच्छे संस्कार विकसित हों। सत्संग से धर्म, नैतिकता, सत्य, करुणा और सद्गुणों की शिक्षा प्राप्त होती है, जिससे बालक जीवन में सन्मार्ग पर चलते हैं और समाज के लिए आदर्श बनते हैं। आज के समय में जहाँ बच्चे अधिकतर मोबाइल और टीवी में व्यस्त रहते हैं, वहाँ सत्संग उन्हें सही दिशा देने का कार्य करता है। यह उनके विचारों को शुद्ध करता है और उन्हें गलत मार्ग पर जाने से बचाता है।

 

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