✒️दीनदयाल बन्दूणी ‘दीन’
कुछ लोग रंदी- याद अंदीं- अप्णि छाप छोड़ि जंदीं।
बिरला हुंदीं-जौंक गुण गंदीं-अप्णि छाप छोड़ि जंदीं।।
एक नाम-जैक कयां काम-तेरि-मेरि ऑख्यूंम रटदीं,
वी प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल अदीं-अप्णि छाप छोड़ि जंदीं।।
हां- पर इना बि त हुदीं कुटंम्ब- जौंक छा प्रतिबिम्ब,
जौंन कुछ कर- सब बतंदीं- अप्णि छाप छोड़ि जंदीं।।
प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल साहित्य का इना प्रतिबिम्ब छया,
जैं उम्रम मन्खि सोच्णां रंदीं-अप्णि छाप छोड़ि जंदीं।।
प्यार से मिलदा छा-खूब हंसदा छा-फोटु खिचदा छा,
इना मन्खि सब्यूं याद अंदीं-अप्णि छाप छोड़ि जंदीं।।
अज्यूंबि दुन्या कख भूलि पांद-यूंकि सदनि याद आंद,
इना मन्खि कख चलि जंदीं-अप्णि छाप छोड़ि जंदीं।।
‘दीन’ बड़थ्वाल कुटम का श्रीमौर-प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल,
हम सब्यूं- याद आ़णां रंदीं- अप्णि छाप छोड़ि जंदीं।।



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