कैसे NDF और SIMI हो गए पीएफआई में तब्दील, तीन दशकों से चला आ रहा आतंक का दुष्चक्र

नई दिल्ली, वर्ष1993 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद केरल में स्थापित हुआ एनडीएफ जल्द ही देश में कथित तौर पर आतंकी गतिविधियों में शामिल हो गया। 2006 में यह पीएफआई के नाम से जाना जाने लगा। फिर तीन दशकों के भीतर इसने 17 राज्यों में कार्यालय और 22 राज्यों में अपना प्रभाव स्थापित किया। 2010 में शिक्षक के हाथ काटने से लेकर 2018 में आईएस आतंकी संगठन से जुड़ने तक। पढ़ें, पीएफआई कैसे धीरे-धीरे अपनी असलियत दिखाने लगा…

देश में कथित तौर आतंकी गतिविधियों में शामिल होने के चलते केंद्र सरकार ने पीएफआई संगठन पर पांच साल के लिए बैन लगा दिया है। संगठन के खिलाफ केंद्र ने डिजिटल स्ट्राइक भी शुरू कर दी है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर भी सरकार इन संगठनों के ग्रुप को ब्लॉक करने जा रही है। तीन दशकों से चल रहे आतंक के इस दुष्चक्र की शुरुआत बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद मानी जाती है। आइए, जानते हैं यह संगठन कब-कब हाईलाइट हुआ…

1993: बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद केरल में कट्टरपंथी मुस्लिम समूहों ने राष्ट्रीय जनतांत्रिक मोर्चा (एनडीएफ) की स्थापना की। बाद के वर्षों में, तमिलनाडु में कर्नाटक फोरम फॉर डिग्निटी (केएफडी) और मनीथा नीति पासारी (एमएनपी) जैसे समान संगठन बनाए गए।

1997: स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया की स्थापना उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में हुई। इसने कई राज्यों में अपना आधार फैलाया।

2001: सिमी को “यूएपीए के तहत राष्ट्र विरोधी गतिविधियों” के लिए “आतंक” में शामिल होने के लिए प्रतिबंधित किया गया था।

2004: एनडीएफ, केएफडी और एमएनएफ का विलय हुआ और दक्षिण राज्यों केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक और फिर एकीकृत आंध्र प्रदेश में संयुक्त कार्रवाई के लिए दक्षिण भारत परिषद का गठन हुआ।

2006: 9 दिसंबर को, साउथ इंडिया काउंसिल को पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया के रूप में नया नाम दिया गया, जिसमें सिमी के कई पूर्व सदस्य संगठन में शामिल हो गए। पीएफआई ने अपने कैडरों के लिए एनडीएफ की वर्दी, मार्शल आर्ट प्रशिक्षण को अपनाया और इसके सदस्यों का रोल नहीं बताया ताकि संगठन में कुछ भी पता नहीं लगाया जा सके।

2009: पीएफआई ने अपनी राजनीतिक शाखा सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (एसडीपीआई) की स्थापना की।

2010: पीएफआई ने देश का ध्यान उस वक्त खींचा जब उसके कार्यकर्ताओं ने मुवत्तुपुझा (एर्नाकुलम) में न्यू मैन्स कॉलेज में मलयालम शिक्षक प्रोफेसर टी जे जोसेफ के हाथ काट दिए। उन पर ईशनिंदा का आरोप लगाया था।

2015: जोसेफ मामले में पीएफआई के 13 कार्यकर्ताओं को उम्रकैद की सजा हुई।

2017: केरल सरकार ने हाई कोर्ट को सूचित किया कि पीएफआई सदस्य 106 आपराधिक मामलों में शामिल थे, जिसमें 27 हत्याएं शामिल थीं, जिनमें से अधिकांश सीपीआईएम और आरएसएस में इसके राजनीतिक विरोधियों की थीं।

2018: अफगानिस्तान में आईएस में शामिल होने के लिए उत्तर केरल के एक गांव से महिलाओं और बच्चों सहित 2018 में कम से कम 22 लोग गायब हो गए। इनमें से कुछ पीएफआई के सदस्य बताए गए।

2019: जैसे-जैसे पीएफआई का प्रभाव बढ़ता गया, उसने अपना मुख्यालय केरल के कोझीकोड से दिल्ली में शिफ्ट कर दिया।

2022: पीएफआई के 17 राज्यों में कार्यालय हैं और 22 राज्यों में प्रभाव है। यूएपीए, शस्त्र अधिनियम और विस्फोटक अधिनियम के तहत लगभग 1,400 मामलों में इसके कार्यकर्ता आरोपी है।

29 अगस्त: केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने पीएफआई गतिविधियों पर हाई लेवल बैठक की और पीएफआई पर ऐक्शन के लिए एक कार्य योजना तैयार की।

22 सितंबर: देश भर में पीएफआई कार्यालयों और प्रमुख पदाधिकारियों के घरों पर देशव्यापी छापेमारी की गई और 106 पीएफआई नेताओं और सदस्यों को गिरफ्तार किया गया।

27 सितंबर: उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, गुजरात, दिल्ली, महाराष्ट्र, असम और मध्य प्रदेश में एक और देशव्यापी छापेमारी हुई। पीएफआई से जुड़े 170 से ज्यादा लोगों को हिरासत में लिया गया।