हितधारक परामर्श बैठक : सरकारी ड्रामे का एक फ्लॉप शो…!

0
149

(एल मोहन लखेड़ा)

देहरादून, भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) की ओर से भानियावाला-ऋषिकेश मार्ग परियोजना के संबंध में हितधारक परामर्श बैठक का आयोजन दून लाइब्रेरी के सभागार में गुरुवार को आयोजित की गयी, इससे पहले इस बैठक के संयुक्त आयोजन का विज्ञापन भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण के द्वारा समाचार पत्रों में भी प्रकाशित कराया गया था।
बुधवार 3 सितम्बर दोपहर ठीक 3:00 बजे से दून के पर्यावरण प्रेमी, स्थानीय नागरिकों, जनप्रतिनिधियों, विषय विशेषज्ञों और संस्थाओं के प्रतिनिधियों का दून पुस्तकालय पहुँचा शुरू हुआ। मौका था विवादित भानियांवाला ऋषिकेश मार्ग परियोजना के अन्तर्गत ‘सात मोड़ रोड चौड़ीकरण’ को लेकर भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण, पीडब्ल्यूडी और वन विभाग के अफसरों के साथ एक बड़े ‘संवाद’ का। पर्यावरण प्रेमी और हितधारक वहां एक लोकतांत्रिक बातचीत की उम्मीद लेकर आए थे, लेकिन वहां पहुँचकर समझ आया कि यह एक सरकारी ड्रामे का फ्लॉप शो सा लगा ।माहौल तो एंट्री गेट पर ही समझ आ गया था। पूरे हॉल में जगह-जगह पोस्टर्स चिपके थे “फोटो खींचना या वीडियो बनाना सख्त मना है।” भाई, खुली जनता की बातचीत में मीडिया पर ऐसा बैन लगाना ही अपने आप में एक बड़ा इशारा था ! पत्रकारों को बड़े प्यार से बाहर ही रोक दिया गया और कहा गया, “प्रेस रिलीज बाद में मिल जाएगी।”
जो लोग समय के पक्के थे और टाइम पर पहुँच गए थे, उनसे कह दिया गया कि आगे की अच्छी सीटें खाली कर दीजिए, क्योंकि हमारे ‘वीआईपी’ अफसरों के लिए जगह रखनी थी। और ये साहब लोग? समय की धज्जियाँ उड़ाते हुए आराम से साढ़े तीन बजे के बाद हॉल में पधारे। सोने पर सुहागा ये था कि लाइब्रेरी के गेट पर पुलिस वालों की ऐसी भारी फ़ौज खड़ी थी, जैसी मैंने आज तक इस लाइब्रेरी में कभी नहीं देखी । ऐसा लग रहा था जैसे कोई इंटरनेशनल समिट चल रही हो, ना की पेड़ों, पहाड़ों और रास्तों पर एक शांतिपूर्ण चर्चा। इसके बाद आया दोपहर का सबसे बड़ा तमाशा, भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण का ‘पावर पॉइंट प्रेजेंटेशन’।
भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण ने जनता को यह समझाने की पूरी कोशिश की कि पहाड़ को काटना और 4,369 पेड़ों को बेरहमी से साफ कर देना, असल में एक पुण्य का काम है जो सिर्फ और सिर्फ ‘हाथियों की भलाई’ के लिए किया जा रहा है! हॉल में बैठी जनता हैरान-परेशान, दांत भींचे बस यह सोच रही थी कि कोई इतना बड़ा झूठ कैसे बोल सकता है!जैसे ही जनता को बोलने का मौका मिला, सबने औपचारिकताएं किनारे रखीं और पूरा हॉल एक ही आवाज में गूंज उठा, “हमें यह प्रोजेक्ट किसी भी कीमत पर नहीं चाहिए, इसे तुरंत बंद करो।”
इसके बाद जनता ने ऐसे सीधे और तीखे सवाल दागे, जिनकी तैयारी सरकारी स्क्रिप्ट में कहीं थी ही नहीं ।
पहला सवाल: ‘गायब हाथियों’ की उलझन अगर यह प्रोजेक्ट सचमुच यहाँ के जानवरों और जंगलों के लिए एक ‘लव लेटर’ है, तो ब्लास्टिंग, ड्रिलिंग और पेड़ों की कटाई के उन 2-3 सालों के दौरान ये हाथी कहाँ जाएंगे ? और पहाड़ों में सड़कों का जो ट्रैक रिकॉर्ड है कि उद्घाटन के पांच मिनट बाद ही वे धंस जाती हैं, तो क्या अब यहाँ के जानवर पहाड़ों पर ट्रैकिंग करना और रॉक-क्लाइंबिंग सीखेंगे ?दूसरा सवाल: रात के आराम का रास्ता हम सीधे ‘नेपाली फार्म’ वाले रूट को चौड़ाकर क्यों नहीं कर सकते, जहाँ पहले से ही जानवरों के निकलने के लिए अंडरपास और रास्ते कामयाब रहे हैं? या फिर उससे भी बेहतर, रात के समय सात मोड़ पर ट्रैफिक को पूरी तरह क्यों नहीं रोक दिया जाता ताकि जानवर आराम से रास्ता पार कर सकें ?
तीसरा सवाल: जब अफसरों से पूछा गया कि किस स्वतंत्र और निष्पक्ष एजेंसी ने यहाँ के ट्रैफिक का सर्वे किया था जिसके आधार पर यह परियोजना को शुरू किया जा रहा है, तो जवाब में कहा—”NHAI ने खुद 2021 में एक हफ्ते का सर्वे किया था।” बहुत बढ़िया! मतलब जिस एजेंसी को प्रोजेक्ट चाहिए, वही उसका सर्वे करेगी, और खुद ही खुद को हरी झंडी भी दे देगी । फिर किसी तीसरी निष्पक्ष एजेंसी की जरूरत ही क्या है ?
चौथा सवाल: वनस्पति विज्ञान की नई खोज, हॉल में तब ठहाके गूंज उठे जब NHAI के प्रतिनिधि ने पूरे भरोसे के साथ कहा कि ‘पेड़ों को उखाड़कर दूसरी जगह लगाने (ट्रांसप्लांटेशन) के लिए बरसात का मौसम सबसे बेस्ट होता है।’ बेचारे लोकल बॉटनिस्ट (पेड़-पौधों के एक्सपर्ट) भी विज्ञान की यह नई थ्योरी सुनकर दंग रह गए ! अब समझ आया कि सरकार का ट्री-ट्रांसप्लांटेशन का रिकॉर्ड हमेशा ‘सन्नाटा’ यानी जीरो क्यों रहता है। असल में यह साफ हो गया कि “ट्रांसप्लांटेशन” और “नया जंगल उगाना” (अफॉरेस्टेशन) सिर्फ कागजी शब्द हैं, जिन्हें बोलकर असली जंगलों को पैसों के बदले ठिकाने लगाया जाता है।
पांचवां सवाल: कीमत का खेल, जब लोगों ने पूछा कि एक अकेले पेड़ को ट्रांसप्लांट करने का असली खर्च कितना आता है, तो अफसरों का पूरा गणित अचानक धुंधला हो गया और वे गोल-मोल बातें करने लगे। इस पूरे ड्रामे का क्लाइमेक्स (आखरी सीन) तो अंत में देखने को मिला। एक लोकल ठेकेदार कुछ महिलाओं को बकायदा झुंड में हॉल के अंदर लेकर आया, जिन्हें सिर्फ इसलिए पैसे देकर लाया गया था ताकि वे खड़ी होकर इस कंक्रीट और तारकोल की सड़क के समर्थन में नारेबाजी कर सकें ।
अब सवाल यह उठता है क्या यह संवाद सिर्फ एक दिखावा था, झूठे ट्रैफिक आंकड़ों से लेकर एआई हाथियों के प्रति उनके नकली प्यार तक, यह सब सिर्फ सरकारी कागजों पर ‘टिक मार्क’ करने के लिए रचा गया एक नाटक था। लेकिन अगर
भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण को लगा था कि देहरादून की जनता उनके इस झांसे में आ जाएगी, लेकिन हितधारक परामर्श बैठक का खेल सभागार में बैठी जनता समझ गयी जो किसी के भी छलावे में आने वाली नहीं है।
गौरतलब हो कि विरोध के बाद पर्यावरण और जनभावनाओं को देखते हुए मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने दून के सात मोड़ क्षेत्र में पेड़ों की कटाई पर तत्काल रोक लगाने के आदेश दिए थे।‌ जिसके बाद भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण द्वारा जनता के सुझावों व संवाद के आधार पर आगे की रूपरेखा तैयार करने के लिए यह आयोजन किया गया था।