देहरादून, दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र की ओर से गुरुवार को उत्तराखण्ड की पारम्परिक रामलीला की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और लोकनाट्य परम्परा पर केन्द्रित एक विशेष कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में कुमाऊं और गढ़वाल की लगभग 166 वर्ष पुरानी रामलीला की विशिष्टताओं पर वार्ता की गई और कलाकारों ने रामलीला के विविध प्रसंगों पर अपनी गायन प्रस्तुतियां दीं । इस अवसर पर संस्कृति प्रेमियों की ओर से उत्तराखण्ड की पारम्परिक रामलीला को ‘हिमालयी अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर’ के रूप में मान्यता दिलाने तथा इसके संरक्षण एवं संवर्धन के लिए राजकीय सहायता उपलब्ध कराने संबंधी घोषणा प्रस्ताव भी पारित किया गया।
कार्यक्रम का उद्देश्य उत्तराखण्ड की पारम्परिक रामलीला की समृद्ध विरासत को सामने लाने, उसकी विविध क्षेत्रीय शैलियों से नई पीढ़ी को परिचित कराने और इस लोकनाट्य परम्परा के संरक्षण के प्रति जनजागरूकता बढ़ाना था।
कार्यक्रम के बीज वक्तव्य में प्रख्यात रंगकर्मी एवं संस्कृति विशेषज्ञ प्रो. डी. आर. पुरोहित ने उत्तराखण्ड की रामलीला के सूत्रधारों और उसकी प्रमुख विशेषताओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने रामलीला को केवल रामकथा के मंचन तक सीमित न मानते हुए इसे लोकसंगीत, गायन, अभिनय, संवाद अदायगी, वेशभूषा और सामुदायिक सहभागिता का विशिष्ट संगम बताया। उन्होंने इस परम्परा के माध्यम से पीढ़ियों तक रंगमंचीय कला और सांस्कृतिक मूल्यों के हस्तांतरण के महत्त्व को भी रेखांकित किया।
चन्द्रशेखर तिवारी ने कुमाऊं की रामलीला के ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक परिदृश्य पर विचार व्यक्त किए। उन्होंने इस परम्परा के क्षेत्रीय स्वरूप, लोकजीवन से उसके संबंध और सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखने तथा उसकी स्थानीय विशिष्टताओं पर प्रकाश डाला।
डॉ. योगेश धस्माना ने पौड़ी की रामलीला की विशेषताओं और उसकी परम्परा के बारे में जानकारी दी और ऐतिहासिक संदर्भ प्रस्तुत किये ।
डॉ. ज्योतिष घिल्डियाल ने देहरादून शहर की पुरानी रामलीला तथा उससे जुड़े अनेड प्रसंगों को साझा कर महत्वपूर्ण जानकारियां दीं।
कुलानंद घनशाला ने गढ़वाली रामलीला पर प्रकाश डाला और गुणानंद पथिक की रामलीला का परिचय देकर उसकी पंक्तियां सुनाईं, वार्ता में वक्ताओं ने विभिन्न क्षेत्रीय शैलियों के दस्तावेजीकरण और संरक्षण की आवश्यकता पर बल दिया।
वार्ता के दौरान रामलीला के चुनिंदा प्रसंगों पर आधारित गायन की प्रस्तुतियां भी दी गई गयीं । गायन प्रस्तुतियों में ज्योति उप्रेती सती, नीरजा उप्रेती, डॉ. शैलेन्द्र मैठाणी, प्रमित कुमार, अलभ्य बडोनी, त्रिष्ठव बडोनी, आइसा कुंवर और धर्मेंद्र सिंह रावत ने अपनी प्रस्तुतियों से श्रोताओं को देर तक मंत्रमुग्ध किया। हारमोनियम की सुरीली धुन और तबले की गमक के साथ इन गायन प्रस्तुतियों ने पहाड़ की पारम्परिक रामलीला संगीत परम्परा को जीवंत कर दिया। कार्यक्रम के समापन पर कलाकारों द्वारा सामूहिक रूप से गाई गई स्तुति ‘श्रीरामचन्द्र कृपालु भज मन’ विशेष आकर्षण का केद्र रही. उपस्थित श्रोताओं ने इस कार्यक्रम में उत्साहपूर्वक सहभागिता की।
इस अवसर पर पारित घोषणा प्रस्ताव में उत्तराखण्ड की पारम्परिक रामलीला को ‘हिमालयी अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर’ के रूप में मान्यता दिलाने के लिए आवश्यक सर्वेक्षण, ऐतिहासिक दस्तावेजीकरण और निर्धारित प्रक्रिया पूरी करने का आग्रह किया गया।
प्रस्ताव में रामलीला समितियों को विशेष राजकीय सहायता देने की मांग की गई। युवा कलाकारों के प्रशिक्षण, वरिष्ठ कलाकारों के सम्मान तथा पारम्परिक संगीत, संवाद और मंचन शैलियों का डिजिटल अभिलेखागार तैयार करने पर जोर दिया गया।कुमाऊं और गढ़वाल की विभिन्न रामलीला शैलियों के आदान-प्रदान एवं प्रदर्शन के लिए प्रतिवर्ष राज्य स्तरीय रामलीला महोत्सव आयोजित करने का सुझाव दिया गया।
दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र साहित्य, इतिहास, कला, लोकसंस्कृति और समकालीन सामाजिक विषयों पर संवाद एवं विचार-विमर्श के अवसर उपलब्ध कराने के उद्देश्य से नियमित कार्यक्रम आयोजित करता है। उत्तराखण्ड की पारम्परिक रामलीला पर केन्द्रित यह आयोजन भी राज्य की सांस्कृतिक विरासत को पहचानने, उसके संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाने और भावी पीढ़ियों तक उसकी निरंतरता सुनिश्चित करने की दिशा में एक सार्थक पहल रहा। दून पुस्तकालय की ओर से प्रस्तुतियां देने वाले कलाकारों को प्रतीक चिह्न देकर सम्मानित भी किया गया।
कार्यक्रम में पंकज नैथानी, डॉ. अतुल शर्मा,, डी.के.पाण्डे, डॉ. लालता प्रसाद, सुंदर सिंह बिष्ट, दक्षा धस्माना, सुरेन्द्र सजवाण, देवेन्द्र काण्डपाल, भगवान प्रसाद घिल्डियाल, आलोक सरीन, लेखक, साहित्यकार संस्कृति, रंगमंच और लोकपरम्पराओं में रुचि रखने वाले बड़ी संख्या में श्रोता गण उपस्थित रहे।




