देहरादून, सिद्धि फाउंडेशन एवं 108 पीस इंस्टिट्यूट के संयुक्त तत्वावधान में दलाई लामा के 91वें वर्ष में प्रवेश करने पर “उनकी आजीवन विरासत” विषय पर एक सेमिनार आयोजित किया गया। सिद्धि फाउंडेशन के संस्थापक कर्नल अजय कोठियाल की प्रेरणा से आयोजित इस सेमिनार में वक्ताओं ने 14वें दलाई लामा की अहिंसा और विश्व शांति की विचारधारा के साथ भारत-तिब्बत के ऐतिहासिक संबंधों को और मजबूत करने पर जोर दिया।
दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र के सभागार में आयोजित सेमिनार में मुख्य वक्ता तिब्बत निर्वासित सरकार के पूर्व सांसद चोक्यांग बांगचुक ने दलाई लामा की ऐतिहासिक विरासत, अहिंसा के सिद्धांत और तिब्बत की स्वतंत्रता के लिए उनके शांतिपूर्ण संघर्ष के बारे में विस्तार से बताया।
सिद्धि फाउंडेशन के संस्थापक और उत्तराखंड राज्य पूर्व सैनिक कल्याण सलाहकार परिषद के अध्यक्ष कर्नल (सेनि) अजय कोठियाल ने कहा कि भारत-तिब्बत संबंधों को और अधिक सुदृढ़ करना समय की जरूरत है। उन्होंने कहा कि भारत-तिब्बत सीमा की सुरक्षा और तिब्बत के उद्देश्य के लिए आपसी सहयोग, विश्वास तथा नियमित संवाद को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
सिद्धि फाउंडेशन के सदस्य व हिमालयन तिब्बत स्टडीज के प्रमुख इंद्रपाल सिंह कोहली ने भारत और तिब्बत के बीच सदियों पुराने सांस्कृतिक व सामाजिक संबंधों, हिमालयी सीमावर्ती क्षेत्रों के ऐतिहासिक व रणनीतिक महत्व को बताया। ये शी दावा ने 108 पीस इंस्टिट्यूट के उद्देश्यों और गतिविधियों की जानकारी देते हुए कहा कि संस्थान तिब्बती समुदाय के हितों और तिब्बत के न्यायपूर्ण उद्देश्य के प्रति प्रतिबद्ध है। इस मौके पर तिब्बती स्वतंत्रता आंदोलन के समर्पित योद्धा लोबसांग रांजन ला को श्रद्धांजलि अर्पित की गई।
सेमिनार में स्वागत संबोधन पर्यावरणविद् जगदीश बाबला ने दिया और कहा कि तिब्बती समुदाय के आचरण, मधुर व्यवहार, अपने काम से काम, धार्मिक आचरण, फालतू की बातों, मोबाइल आदि से दूर रहकर अपने कार्य पर समर्पित एकाग्रता से शिक्षा ली जा सकती है। इस अवसर पर कई सामाजिक कार्यकर्ता, लेखक, पत्रकार और साहित्यकार मौजूद रहे।


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