देहरादून, दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र की ओर से अंजू राणा की पुस्तक ‘माई ट्रिस्ट विद कैन्सर’ का लोकार्पण केन्द्र के सभागार में किया गया, लोकार्पण के पश्चात इस पुस्तक पर एक चर्चा भी की गई।
कार्यक्रम की अध्यक्षता सुपारचित चिकित्सक पदमश्री डॉ. बी.के.एस. संजय ने की, कार्यक्रम में चर्चाकार के तौर पर दून पुस्तकालय के मानद निदेशक एन रवि शंकर तथा वैली ऑफ वर्ड्स के संस्थापक निदेशक डॉ. संजीव चोपड़ा उपस्थित रहे, चर्चा का संचालन सुनीता विजय ने किया, कार्यक्रम में कैंसर और उसके प्रबंधन पर डॉ. नैना कुमार एक संक्षिप्त व्याख्यान भी दिया।
चर्चा में वक्ताओं का कहना था कि कैंसर जूझ रहे तथा उससे बचाव कर रहे एक व्यक्ति के संस्मरणों पर आधारित इस पुस्तक को जीवन में आशा, साहस, दृढ़ता, दोस्तों और परिवार के मध्य एक महत्वपूर्ण पुस्तक के तौर पर देखा जाना चाहिए, पुस्तक का सबसे महत्वपूर्ण सकारात्मक पक्ष यह है कि हमें इस बात को ध्यान में रखने की आवश्यकता है – जो परिस्थितियाँ हमें आकर घेरती हैं वे कभी भी हमारे नियंत्रण में नहीं होती हैं, और यह हमारी उनसे निपटने की दृष्टि है जो हमें परिभाषित करती है कि हम कौन हैं और हम उनका सामना किस निर्भीकता व सहजता से करते हैं।
कुल मिलाकर यह खूबसूरत डायरी अंजू राणा की कहानी को बयां करती है, जिन्होंने अपनी बीमारी को अपने हौसले को तोड़ने नहीं दिया। पूरी ईमानदारी और दिल से, उन्होंने अपने इलाज, अपने सामने आए डर और शंकाओं, और उस साहस और उम्मीद के बारे में बताया है जिसने उन्हें इन मुश्किलों से उबरने में मदद की।
वक्ताओं का कहना था कि आशा जानी होगी कि अंजू राणा की यह कहानी उन सभी लोगों को प्रेरित करते का कार्य करेगी जो अभी भी कैंसर जैसी बीमारी का शिद्दत के साथ मुकाबला करते हुए अपनी जिन्दगी को आगे बढ़ाने का सकारात्मक प्रयास करते आ रहे हैं।
अंजू राणा ने अपनी स्कूली शिक्षा मेरठ के सोफिया स्कूल से पूरी की। उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से स्नातक और बी.एड. की उपाधि प्राप्त की और बाद में अन्नामलाई विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में स्नातकोत्तर डिग्री हासिल की।
कम उम्र में एक भारतीय वन अधिकारी से शादी करने के बाद, उन्होंने अपने वैवाहिक जीवन का अधिकांश समय उत्तर-पूर्वी भारत में बिताया और जब भी परिस्थितियाँ अनुकूल हुईं, स्कूलों में पढ़ाया। वे दो बेटों की गर्वित माँ और चार नाती-पोतों की दादी हैं। पति के देहांत के बाद लेखन उनका सहारा बन गया। उनकी पहली हिंदी कविता संग्रह, ‘तुम बिन’ (नवंबर 2025), को खूब सराहा गया। ‘माई ट्रिस्ट विद कैंसर’ उनके जीवन के सबसे कठिन दौर का आत्मकथात्मक वर्णन है – जिसे उन्होंने अपनी यात्रा साझा करने और कैंसर का इलाज करा रहे अन्य लोगों को आशा, विश्वास और शक्ति प्रदान करने के लिए लिखा है।
प्रारंभ में केंद्र के कार्यक्रम अधिकारी चन्द्रशेखर तिवारी ने अतिथि वक्ताओं व उपस्थित लोगों का हार्दिक स्वागत किया।
इस अवसर पर शहर के कई प्रबुद्ध लोग, लेखक, साहित्य कार, पाठक गण सहित पूर्व मुख्य सचिव नृप सिंह नपल्याल,डॉ. डी.एन. भटकोटी, मनोज पंत, पूर्व मुख्य वन संरक्षक, उत्तराखण्ड, श्री जय राज, डाॅ. पंकज नैथानी, सिद्धान्त अरोड़ा, शर्मिला भरतरी,लालता प्रसाद, सुन्दर सिंह बिष्ट, जगदीश महर, विजय भट्ट, आलोक कुमार सरीन, कल्याण बुटोला,शांता रवि शंकर, अवि नंदा, अनिल कुमार, शांति प्रकाश जिज्ञासु, हैरी शेट्टी, एस.के. गुप्ता व केन्द्र के पुस्तकालयाध्यक्ष डॉ. डी. के. पाण्डे आदि मौजूद थे।



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