रायपुर (छत्तीसगढ़), देश की आजादी में असंख्य जनजातीय वीरों ने अपनी आहुतियां दी, उनकी इस संघर्ष की गाथा से रूबरू होने पहुंचा उत्तराखंड़ के पत्रकारों का प्रतिनिधि मंडल, पत्रकारों का 13 सदस्यीय दल ने पीआईबी के सहायक निदेशक संजीव सुन्द्रियाल के नेतृत्व में शुक्रवार को रायपुर के शहीद वीर नारायण सिंह स्मारक सह जनजातीय स्वतंत्रता संग्राम सेनानी संग्रहालय का भ्रमण कर आदिवासी संस्कृति और उनकी संघर्ष गाथा को गहराइयों से जाना।
किसी संग्रहालय में जाकर अगर इतिहास को सिर्फ शीशे के भीतर रखी पुरानी वस्तुओं में तलाशना पड़े तो वह अनुभव कुछ ही देर में खत्म हो जाता है। लेकिन नवा रायपुर का ट्राइबल म्यूजियम इस धारणा को बदल देता है। यहां इतिहास सिर्फ दिखाई नहीं देता, बल्कि उसे महसूस करने का अवसर मिलता है। जनजातीय समाज की जीवनशैली, वेशभूषा, आभूषण, परंपराएं, लोक विश्वास, आजीविका और संघर्ष को जीवन-आकार की प्रतिमाओं और आधुनिक डिजिटल तकनीक के माध्यम से जीवंत किया गया है।
इस संग्रहालय में करीब 650 से अधिक प्रतिमाएं और 16 गैलरियां हैं। हर गैलरी जनजातीय समाज के किसी न किसी पहलू से परिचित कराती है। प्रवेश करते ही दर्शक के सामने ऐसा संसार खुलता है, जिसमें जंगल, गांव, खेती, परंपरा और सामुदायिक जीवन एक-दूसरे से जुड़े दिखाई देते हैं।म्यूजियम की सबसे बड़ी विशेषता इसकी प्रस्तुति है। संग्रहालय में रखी जीवन-आकार की प्रतिमाएं केवल देखने के लिए नहीं हैं, बल्कि इनके माध्यम से जनजातीय जीवन की परिस्थितियों को समझाया गया है। पारंपरिक पहनावे से लेकर आभूषण, कृषि कार्य, घरेलू जीवन और सामाजिक आयोजनों तक को दृश्य रूप में प्रस्तुत किया गया है।
यही वजह है कि बच्चों और युवाओं के लिए भी यह संग्रहालय आकर्षण का केंद्र बनता है। जो बातें किताबों में पढ़ने में कठिन लगती हैं, वे यहां दृश्यों के माध्यम से आसानी से समझ में आती हैं। संग्रहालय की एक और खासियत आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल है। डिजिटल स्क्रीन, ऑडियो-विजुअल प्रस्तुति और प्रोजेक्शन मैपिंग जैसे माध्यमों से इतिहास को रोचक ढंग से प्रस्तुत किया गया है। तकनीक और परंपरा का यह मेल संग्रहालय को पारंपरिक संग्रहालयों से अलग पहचान देता है।
म्यूजियम में आदिवासी स्वतंत्रता सेनानियों और जनजातीय आंदोलनों को भी प्रमुख स्थान दिया गया है। वीर नारायण सिंह और गुंडाधुर जैसे नायकों की गाथा बताती है कि अंग्रेजी शासन के खिलाफ संघर्ष में आदिवासी समाज की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण रही। मीडिया प्रतिनिधिमंडल दल ने संग्रहालय में वर्ष 1859 में कोई (कोया) क्रांति, 1856 में हुई लिंगागिरी क्रांति आदि के माध्यम से आदिवासी स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की वीर गाथा को देखा और समझा।संग्रहालय विरासत आने वाली पीढ़ियों को अपनी संस्कृति, कला, साहित्य, खानपान, वेशभूषा और रहन-सहन से परिचित कराने के साथ ही अपने अधिकारों के लिए किए गए संघर्षों की गाथा समझने का माध्यम बन रही है।
इस संग्रहालय को देखने के लिए देश के विभिन्न राज्यों से लोग आते हैं और इतिहास से जुड़ी जानकारी लेकर जाते हैं।यहां की तस्वीरों से आदिवासी संघर्षों को जानने का मौका मिलता है। तस्वीरें यह दर्शाती है कि अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने में कोई परेशानी नहीं चाहिए।संग्रहालय के कर्मचारियों ने बताया कि संग्रहालय में जनजातीय संघर्ष की गाथा से जुड़ी जानकारियां मिलती हैं।इस तरह का संग्रहालय देश में कहीं नहीं है। इस संग्रहालय को 01 नवंबर 2025 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश के नाम समर्पित किया ।




