देहरादून, विश्व आईवीएफ दिवस के उपलक्ष्य में आज आईवीएफ इंडिया केयर (केयर आईवीएफ यूनिट) की ओर से एक निःशुल्क परामर्श एवं जांच शिविर आयोजित किया गया। इस शिविर में संतान सुख की चाह रखने वाले 15 दंपतियों को वरिष्ठ स्त्री रोग एवं बांझपन विशेषज्ञ डॉ. सुमिता प्रभाकर ने स्वयं निःशुल्क परामर्श देकर उनकी समस्याओं को समझा और उपचार की दिशा में मार्गदर्शन दिया।
उल्लेखनीय है कि 25 जुलाई 1978 को विश्व की पहली टेस्ट-ट्यूब बेबी लुईस ब्राउन का जन्म हुआ था, और इसी की स्मृति में प्रतिवर्ष यह दिवस मनाया जाता है।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए डॉ. सुमिता प्रभाकर ने कहा कि वर्ष 2008 में स्थापना के बाद से आईवीएफ इंडिया केयर ने बांझपन के उपचार के क्षेत्र में एक लंबा और उल्लेखनीय सफर तय किया है। उन्होंने बताया कि हाल ही में केंद्र के एक आईवीएफ बैच में शत-प्रतिशत सफलता दर हासिल हुई है, जो केंद्र की चिकित्सकीय दक्षता और अत्याधुनिक उपचार पद्धति का परिचायक है।
डॉ. प्रभाकर ने बताया कि बीते वर्षों में जहां लोग संकोच और सामाजिक झिझक के चलते बांझपन जैसे विषय पर खुलकर बात नहीं कर पाते थे, वहीं अब जागरूकता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है और दंपती समय रहते विशेषज्ञों से संपर्क करने लगे हैं। उन्होंने यह भी बताया कि पिछले कुछ वर्षों में उपचार के लिए आने वाले मरीजों की संख्या में भी काफी इज़ाफा हुआ है।
इसके पीछे कई कारण गिनाए जा सकते हैं :
बदलती जीवनशैली, देर से विवाह और देर से परिवार नियोजन का चलन, बढ़ता तनाव, मोटापा और अनियमित खान-पान, तथा प्रदूषण जैसे पर्यावरणीय कारकों का प्रजनन क्षमता पर पड़ने वाला असर। इसके साथ ही मीडिया और सोशल मीडिया के माध्यम से बढ़ी जागरूकता के चलते अब पहले से कहीं अधिक दंपती खुलकर सामने आकर उपचार करा रहे हैं, जो एक सकारात्मक बदलाव है।
डॉ. प्रभाकर ने एक बड़ी भ्रांति को दूर करते हुए स्पष्ट किया कि आईवीएफ से जन्मे बच्चों में किसी तरह की शारीरिक या मानसिक समस्या होने की धारणा पूरी तरह निराधार है। दशकों के शोध और दुनिया भर में लाखों सफल जन्मों के आंकड़े यह प्रमाणित कर चुके हैं कि आईवीएफ तकनीक से जन्मे बच्चे सामान्य गर्भधारण से जन्मे बच्चों जितने ही स्वस्थ होते हैं। इस भ्रम के चलते कई दंपती बेवजह उपचार में देरी कर देते हैं, जो अंततः उनके लिए नुकसानदेह साबित होता है।
डॉक्टर से कब संपर्क करें :
इस पर उन्होंने कहा, “अगर शादी के एक साल तक कोशिश करने के बावजूद गर्भधारण नहीं हो रहा, तो डॉक्टर से जरूर मिलें। अगर महिला की उम्र 35 साल से ज्यादा है तो 6 महीने बाद ही सलाह ले लेनी चाहिए। देरी करने से उम्र के साथ सफलता की संभावना कम होती जाती है, इसलिए जितनी जल्दी जांच होगी, इलाज उतना ही आसान और असरदार होगा।”
बांझपन से जूझ रहे दंपतियों को सलाह देते हुए डॉ. प्रभाकर ने कहा कि समस्या महसूस होते ही समय रहते विशेषज्ञ से संपर्क करना चाहिए, देरी नहीं करनी चाहिए। साथ ही संतुलित खान-पान, नियमित दिनचर्या और तनाव से बचाव पर ध्यान देना, धूम्रपान व शराब जैसी आदतों से दूरी बनाना, वजन नियंत्रित रखना और नियमित शारीरिक सक्रियता बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है। उन्होंने कहा कि सबसे महत्वपूर्ण है इस विषय को शर्म या झिझक का कारण न बनाना, दंपती एक-दूसरे का साथ दें और खुलकर बात करें, तभी सही समय पर सही इलाज संभव हो पाएगा।
कार्यक्रम में शामिल दंपतियों ने आयोजकों का आभार व्यक्त करते हुए इसे एक सराहनीय और प्रेरणादायक पहल बताया।


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