(दिनेश ध्यानी)
कल यानि 16 जनवरी, 2026 को दिल्ली के गंगाराम अस्पताल में मनमोहन उप्रेती ने अंतिम साँस ले। दिल्ली जैसे महानगर के लिए वैसे तो यह एक आम बात है। आये दिन कई लोग जन्म लेते हैं कई इस संसार से चले जाते हैं। दिल्ली के सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता। समाज की बात करें तो समाज पर भी कोई खास फर्क नहीं पड़ता इसलिए मनमोहन उप्रेती का जाना भी वैसे एक आम आदमी का चले जाना भर हो सकता है लेकिन मनमोहन उप्रेती एक आम आदमी के अंदर एक उम्दा कलाकार भी चला गया। एक ऐसा कलाकार जिसने सत्तर-अस्सी के दशक से मंचों पर अपने अभिनय से अपना अलग मुकाम बनाया था। उसे रंगमंच की समझ किसी स्कूल या ड्रामा डिवीज़न ने नहीं दी थी उसने तो आप ही इस कला को सीखा और जिया। लेकिन जीवन के आपाधापी ने मनमोहन उप्रेती के अंदर के कलाकार को किसी कोने में दुबका दिया। लेकिन गाहे बगाहे वह कलाकार जब जोर मारता तो उसे जानने की इच्छा होती की दिल्ली में रंगमंच में क्या हो रहा है। और पिछले साल वह कलाकार फिर से रंगमंच में सक्रिय भी हुवा और उसने साबित किया की उसने भले दशको पहले रंगमंच को छोड़ दिया या मज़बूरी ने उससे छुड़वा दिया हो लेकिन उसके अंदर वही मंजा हुआ कलाकार अभी भी ज़िंदा है। लेकिन अफ़सोस अपनी दूसरी पारी को बिंदास शरू करने से पहले ही वह कलाकार विश्व रंगमंच से दूर चला गया। अपने पिताजी जी के साथ लगातार पारिवारिक कार्य में हाथ बांटते रहे तथा विनम्र भाव से जीवनयापन करते रहे। भाइयों में सबसे बड़े होने के कारण उनका स्वभाव विनम्र और शांत था। कभी भी उनको ऊँची आवाज में बात करते हुए नहीं देखा। अपने अनुज बृजमोहन उप्रेती के ऑफिस में भी वे जब भी आते थे एकदम शांत रहते थे और हमेशा उनके चेहरे पर मुस्कराहट रहती थी।
दिल्ली में पंचकुईयां मार्ग के समीप अंधमहाविद्यालय के परिसर में उप्रेती निवास है वहीँ आज से लगभग तीस साल पहले मनमोहन उप्रेती जी से मुलाकात हुई। उनके पिताजी स्वर्गीय बालकिशन उप्रेती जी का बुक बॉन्डिंग का काम था। मन्नू भाई भी वहीँ पिताजी के साथ काम में हाथ बंटाते थे। एक बार अपनी एक किताब को बॉन्डिंग करवाने के लिए मैंने मन्नू भाई को दिया। तब उन्होंने ने पूछा कि क्या तुम लिखते हो? फिर वहीँ से उनके साथ बात होने लगी। जब उनको पता कि मैं लिखता हूँ व कवि भी हूँ। तो सबसे पहले मन्नू भाई ने कहा कि सुरेश नौटियाल को जानते हो? मैंने कहा हाँ जनता हूँ। तो उन्होंने कहा कि नौटियाल जी मेरे दोस्त हैं, हम दोनों ने हाई हिलर्स में एक साथ कई नाटकों में काम किया है।
उन्होंने कई नाम गिनाये जो अपने ज़माने के जाने पहचाने नाम थे . जैसे राजेंद्र धस्माना, मित्रानंद कुकरेती, सुशीला रावत और खुशहाल सिंह बिष्ट आदि। तब लगा कि ये सच में रंगमंच से परिचित हैं। फिर मन्नू भाई से अक्सर जब भी मिलना होता था तो वे अपने मित्र सुरेश नौटियाल जी बारे जरूर पूछते थे।
ज़िन्दगी की आपाधापी में एक कलाकार और उसका हुनर भले ही कुछ समय के लिए दब गया था। समय के साथ उनके अंदर का कलाकार ज़िंदा रहा। हाल के वर्षों में मन्नू भाई लगातार सामाजिक सरोकारों से जुड़े रहे। कहीं भी कोई आयोजन खासकर नाटक होता तो वे जरूर पहुँच जाते थे। और यही कारण रहा की विगत वर्ष 2025 में मनमोहन उप्रेती जी ने रंगमंच में वापसी की और पिछले वर्ष दि हाई हिलर्स संस्था द्वारा डॉ सतीश कलेश्वरी द्वारा लिखित मधु मंडाण नाटक का मंचन आईटीओ के एलटीजी सभागार में मंचन किया गया थे जिसमें मनमोहन उप्रेती जी ने बहुत ही उम्दा अभिनय करके सबको आश्चर्य चकित कर दिया कि एक कलाकार के अंदर जो कलाकार होता है वह हमेशा ज़िंदा रहता है। उसको जब मौका मिलता है तो वह अपनी प्रतिभा जरूर दिखाता है। लेकिन मन्नू भाई को कुछ दिनों से समस्या हो रही थी। उनके अनुज बरिष्ठ समाजसेवी और दिल्ली एनसीआर में उत्तराखण्ड के सरोकारों के लिए समर्पित उत्तराखण्ड राज्य आंदोलनकारी बृजमोहन उप्रेती द्वारा मन्नू भाई को गंगाराम अस्पताल में भर्ती करवाया गया था। लेकिन मन्नू भाई 16 जनवरी, 2026 को रात को अलविदा कहकर अनंत यात्रा पर चले गए। उनके परिवार में पत्नी व बच्चों के अतरिक्त दोनों भाइयों और बहनों का भरपूरा परिवार है। मनमोहन उप्रेती जी का एक बेटा और एक बेटी हैं दोनों बच्चों की शादी हो चुकी है। परिवार की जिम्मेदारियों को पूरा करके मात्र 63 साल की उम्र में मनमोहन उप्रेती अचानक चले गए। जो इस दुनिया में आया है सबको जाना है लेकिन इतनी कम उम्र में जब कोई चला जाता है तो परिवार के लिए तो आजीवन दुःख होता है और सभी शुभचिंतकों को दुःख तो होता ही है।
गढ़वाली रंगमंच के इस सुशील, सौम्य और शालीन बरिष्ठ कलाकार को विनम्र श्रद्धांजलि। भगवान् इस दिवंगत आत्मा को अपने श्री चरणों में स्थान दें और परिजनों को इस दुःख को सहन करने की शक्ति दें।



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