क्यों है जरूरी लॉक डाउन में उत्तराखंड के सरकारी कार्यालयों का अनलॉक होना

🅰️bitfar राजेन्द्र नेगी एवं एल. मोहन लखेड़ा

लॉक डाउन को लेकर केंद्र द्वारा एक के बाद एक राहत भरे तमाम दिशा निर्देशों के बाद भी उत्तराखंड के अधिकांशतया सरकारी कार्यालयों को गैरजरूरी मानते हुए बंद रखने का फैसला हैरानी भरा लगता है, वो भी तब जब यहाँ सामाजिक दूरी की शर्तों के अनुकूल कार्य संस्कृति है और उसका अनुपालन कराना सबसे मुफीद है | बेशक देश भर में लॉक डाउन 23 मार्च से शुरू हुआ हो लेकिन यहाँ सरकारी विभागों का लॉक तो 2 मार्च से ही डाउन है, पहले हड़ताल के चलते फिर कोरोना काल के चलते | अफसोस के साथ कहना पड़ता है कि प्रतिदिन करोड़ों रुपए के खर्च पर कार्यरत ऐसे लगभग दो लाख कर्मचारी यदि इतने गैर जरूरी कार्य करते हैं कि उनके बंद या खुला होने से कोई खास फर्क ही नहीं पड़ता है तो तुरन्त इनसे बेहतर विकल्पों पर विचार किया जाना चाहिए, अन्यथा जाम पड़े सरकारी तंत्र को सुचारु कर जनकल्याण कार्यों की प्रक्रिया को सम्पूर्ण लॉक डाउन खुलने तक पटरी पर लाया जाये |

उत्तराखंड के लिए राहत की खबर लेकर आई है केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की कोरोना संक्रमण को लेकर सभी जिलों की कैटेगरी सूची, जिसमें सूबे का एक जिला रेड जोन, 2 जिले ऑरेंज और शेष सभी 10 जिले ग्रीन जोन में शामिल है, उनमें 7 तो ऐसे हैं जहां कभी कोई कोरोना केस सामने ही नहीं आया | बावजूद इसके उत्तराखंड सरकार ने अति सुरक्षतात्मक अपनाते हुए अभी तक अधिक छूट नहीं दी है द्यदपि ऐसे में यदि अब भी अधिकांशतया सरकारी कार्यालयों को लॉक डाउन के नए दिशानिर्देशों के अंतर्गत अनलॉक नहीं किया गया तो यह राज्य की सेहत के लिए सही नहीं होगा | एक तो पहले से ही हड़ताल के चलते सरकारी कामकाज लगभग ठप्प था उस पर लॉक डाउन की मार, वो भी वित्तीय वर्ष के अंतिम महीनों में, जब साल भर का लेखा जोखा व अन्य महत्वपूर्ण कार्य संपादित किया जाता है | यहाँ गौरतलब है कि सामाजिक दूरी का पालन करवाते हुए कार्य करने के लिए सरकारी दफ्तरों से बेहतर कोई संस्थान नहीं हो सकता | उस पर यदि आज भी इनको सुचारु किया जाता तो भी इनके पब्लिक डीलिंग की स्थिति में आते आते कई दिन लग जाएँगे, तब तक लॉक डाउन से आम लोगों को दी गयी छूट की समय सीमा पूरी जाएगी | इस सबका परिणाम यह होगा कि लॉक डाउन खुलने के बाद सरकारी तंत्र अपनी रफ्तार से कार्य करने की स्थिति में होगा | कर्मचारी का फोन पर उपलब्ध होना और जरूरी कार्य घर से निपटाने का आदेश किसी भी तरह से व्यवहारिक नहीं माना जा सकता है | क्योंकि जिन पर दफ्तरों की कुर्सियों में बैठकर कार्य नहीं करने के आरोप लगना आम बात हो उनसे घर बैठ कर काम करने की उम्मीद करना बेहद नाइंसाफी है | अमूमन कार्य की अधिकता का रोना रोने वाले सरकारी विभाग के लिए तो यह सबसे स्वर्णिम अवसर है सभी बकाया फाइलों को निपटाने का | लिहाजा इस सबका फायदा अंततह जन सामान्य को ही होने वाला है | यदि मान भी लिया जाये ये तमाम कार्यालय गैर जरूरी कार्य भी करते हैं तो भी बेहतर है उनको बंद करने के बजाय समाज में सोशल डिस्टेन्सिंग और अन्य महत्वपूर्ण कार्यों के अनुपालन में मदद ली जाये |

चूंकि प्रदेश और देश दुनिया के पूरी तरह से कोरोना मुक्त होने में अभी कई महीने लगने वाले हैं लिहाजा राज्य सरकार को अपने निर्णय पर पुनर्विचार करते हुए अपने तंत्र को सक्रिय कर जन भागीदारी की पूर्ववर्ती स्थिति की और बढ़ना चाहिए | निश्चित रहे केंद्र सरकार आम लोगों को राहत देने के लिए दिशा निर्देश ही जारी कर सकती है लिहाजा सरकारी कार्यालय खोलने के आदेश की प्रतीक्षा करना व्यर्थ है |