विश्व परिवार दिवस पर विशेष : त्याग की भावना ही जीवित रखती संयुक्त परिवार धारणा

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(चन्‍द्र शेखर पैन्‍यूली)

आज विश्व परिवार दिवस है,परिवार से अभिप्राय संयुक्त अथवा एकल परिवार से है, संयुक्त परिवार में हम दादा दादी,ताऊ,चाचा,बुवा आदि सभी लोगों के साथ उनके बच्चों के साथ मिलकर रहते हैं, जबकि एकल परिवार में पति,पत्नी और उनके बच्चे ही आते हैं,बेहद दुःखद है कि आज संयुक्त परिवार टूटते जा रहे हैं,

वर्ष 1994 से मनाया जा रहा विश्व परिवार दिवस संयुक्त राष्ट्र अमेरिका ने 1994 को अन्तर्रराष्ट्रीय परिवार वर्ष घोषित किया था. तब से विश्व में लोगों के बीच परिवार की अहमियत बताने के लिए हर साल 15 मई को अंतरराष्ट्रीय परिवार दिवस मनाया जाने लगा और 1995 से यह सिलसिला जारी है।

आज परिवार में आपसी फूट एक बड़ी समस्या है,प्रायः देखने को मिलता है संयुक्त परिवार किसी एक या दो सदस्यों के अहंकार,अपने को श्रेष्ठ बताने की होड़ या अपने को अपने भाई बहनों से अधिक स्मृद्ध समझने के कारण,अच्छे खासे परिवारों में टूट आ रही है,बेहद दुःख होता है जब एक ही थाली में खाने वाले सगे भाई बहन,या चचेरे भाई बहन एक दूसरे के जान के प्यासे या कट्टर दुश्मन बन जाते हैं। न जाने क्यों समाज में ऐसी कटुता आ रही है कि परिवार टूटते जा रहे हैं, कई बार शादी के बाद भाइयों में तनाव आ जाता है,कई बार पैत्रिक सम्पति बंटवारा आपस में तलवारें खिंचा देती है,कई बार भाई भाई अपनी पत्नियों की झूठी बातों में आकर अपनों से अलग हो जाता है।कई बार अच्छे खासे परिवार में कोई बाहरी व्यक्ति फूट डलवाकर उन्हें अलग अलग कर देता है।

सोचनीय विषय यह है कि आखिर क्यों हम अलग हो रहे हैं? आखिर एक ही खून से बंधे होने के बाद भी आज इंसान अपनों के ही खून का प्यासा क्यों बन रहा है?क्या बंगला,गाड़ी,नौकर ,चाकर,आधुनिक सुख सुविधा हमे अपनत्व का अहसास कराते हैं?कोई भी भौतिक सुख सुविधा कभी भी भाई बहनों के बराबर नही हो सकती है। आखिर क्यों देवरानी,जेठानी में मनमुटाव हो रहा है,क्यों,ननद भाभी के बीच में दुश्मनी देखने को मिल रही है,क्यों भाई बहन,,भाई ,भाई आपस में सम्बन्ध विच्छेद कर रहे हैं।असल में हम लोग देखादेखी में लगे हैं, कई बार संयुक्त परिवार में कमाने वाले को लगता है वही सबका भरण पोषण कर रहा है,बाकि सब ऐश कर रहे हैं, जबकि सच्चाई ये है कि कई बार संयुक्त परिवार में ये ही पता नही होता किसके भाग्य से किसे रोटी मिल रही है,कम से कम हम भारतीयों के तो ऐसे संस्कार नही थे,लेकिन आज हम भारतीय भी पाश्चात्य संस्कृति को अपना कर अपनों से दूर हो रहे हैं।

याद रखें आप गाड़ी,बंगला,नौकर,चाकर खरीद सकते हैं अपनी जिंदगी ख़ुशी खुशी बिता सकते हैं ,ऐश मौज के लिए पूरी दुनिया के किसी भी कोने का व्यक्ति आपका सगा बन जाये लेकिन जब कोई दुःख सामने आयेगा तो सबसे अधिक दुःख दुश्मन बन चुके खून के रिश्तों को ही होगा,कई बार ये भी देखा गया कि संयुक्त परिवार को बढ़ाने वाले व्यक्ति से मतलब निकल जाने के बाद उसके भाई बहन अलग होकर उल्टा उसके योगदान पर ही प्रश्नचिन्ह खड़ा करते हैं कि इसने किया ही क्या है?हमारे लिए तो कुछ नही किया,वो अपने अतीत को भूल जाते हैं कि उन्हें कठिन परिस्थितियों से निकालकर बाहर कौन लाया।

आज टूटते परिवार और अपनों के बीच बढ़ती खटास एक बड़ी चुनौती सामने आ रही है,न जाने परिवारों को तोड़ने वाले मूर्खों में ऐसा क्या अहंकार आ गया कि उन्हें परिवार के आपसी प्रेम को खत्म करने में अच्छा लगता है।याद रखें एकता में ही शक्ति है,जब तक परिवार साथ रहेगा तब तक ताकत बढ़ी हुई रहेगी वरना अकेले में आप कमजोर होते जाओगे,कभी भी अपनों को न नकारे न जाने कब कौन काम आ जाये,हो सकता है आज जिसे देखकर आप दूर हो रहे भविष्य में उसी का सहारा लेना पड़े।अतः अपने परिवार को कभी भी टूटने न दे,किसी दूसरे के बहकावे में न आएं, घर की बात घर में ही बैठकर सुलझाएं,अपनों के साथ अपने अहंकार को न पनपने दे ,अपनी कमाई को ही परिवार में श्रेष्ठ न समझें, सभी बच्चों को समान प्यार दे, बच्चे किसी भी भाई बहन के हो कोई भेदभाव बच्चों में न हो,बड़े भाई को बड़े का सम्मान मिले और छोटे को छोटे का प्यार स्नेह और अपनत्व,आपसी सम्बन्धन में हर व्यक्ति को निजी अहंकार त्यागकर खुले मन से एक दूसरे का साथ देना चाहिए,मिल बैठकर किसी भी समस्या का समाधान ढूंढे,किसी सुनी सुनाई बातों पर अपने परिवार को न तोड़े,न टूटने दें,किसी दूसरों के कहने से अपनों से बैर न रखे,याद रखे आप सब कुछ खरीद सकते लेकिन खुशियां नही,खुशियां अपनों के प्यार प्रेम से मिलती है।और हम तो वैसे भी भारतीय हैं जिनके संस्कारो में वसुधैव कुटुम्बकम की भावना समाही है, जब दुनिया को परिवार मान सकते हैं तो अपने खून के रिश्तों से दूरी क्यों?