स्मृति पुंज : उत्कृष्ट विधाओं का ध्वजवाहक स्व. प्रकाश पुरोहित ‘जयदीप’

(+भुवन नौटियाल)

हम अपनी महानता के अक्स को बतौर प्राचीन सभ्यता, संस्कृति व परम्परा में देखते आये हैं | महानता के पर्याय ‘बसुदेव कुटुम्बकम्’ विश्व बंधुत्व, सर्वे भवन्तु सुखिना,अतिथि देवो भव: के शाब्दिक उद्घोषणा के साथ | हमारी ऐतिहासिक/पौराणिक पृष्ठभूमि ही धर्म और समाज की नींव और जरुरत बनी, जिसे शुद्धता वादियों ने मजबूत किया | उत्तराखण्ड में प्रख्यात कवि सुमित्रानन्दन पंत और चन्द्रकुवंर बर्त्वाल की परम्परा की ध्वजवाहक के रूप में आगे बढाने वाले कवि, लेखक, पत्रकार एवं चित्रकार स्व. प्रकाश पुरोहित ‘जयदीप’ के जन्मदिन पर शतशत् नमनः
अपनी उत्कृष्ट विद्याओं में सबका प्रिय बनने के बाद अचानक युवा अवस्था में ही इस दुनिया से चले जाना हम सब के लिये अपूर्णनीय क्षति हुयी है। जन्मदिन के अवसर पर उनकी स्मृतियों को आपके साथ साझा करना चाहता हूॅ-
किमाणा गांव की आपदा
सन् 1985 के आसपास की घटना है कि जनपद चमोली के जोशीमठ विकासखण्ड के किमाणा गांव में डिफटिरिया (गला घौंटू रोग) से गांव के 32 बच्चों की मौत हो गयी, गांव के स्कूल में घन्टी बजाने वाला भी कोई बच्चा ही नहीं रहा, गुरूजी स्वयं अंश्रुपूरित नेत्रों से घन्टी बजाने का असफल प्रयास कर रहे थे। जैसे ही यह समाचार गोपेश्वर जिला मुख्यालय पर पहुंचा सरकारी डाक्टरों की टीम वहां पहुंची, श्री चंड़ीप्रसाद भटृ जी के छोटे बड़े ओमप्रकाश भटृ तथा निजी प्रैब्टिशनर डा0 जे.पी. भटृ जी दवाई व राहत सामग्री लेकर गांव में पहुंचे।
उस समय अपर गढ़वाल (चमोली व रूद्रप्रयाग) से मैं नवभारत टाइम्स का संवाददाता था, प्रकाश पुरोहित जयदीप इस दुखद समाचार को लेकर मेरे पास आये तब मैं टेलीग्राम से समाचार भेजता था टेलीग्राम लाइन खराब थी, हरिद्वार में नवभारत टाइम्स का ऑफिस था बस से समाचार भेजा साथ में जयदीप ने एक फोटो महिलाओं के ग्रुप का भी दिया जिसमें बताया गया कि ये किमाणा गांव की महिलायें है जिनकी गोद सूनी हो गयी, यह फोटो भी समाचार के साथ दिल्ली भेज दी।                                    दूसरे दिन गोपेश्वर से जयदीप का फोन आया कि भाईसाहब कल बड़ी गलती हो गयी है जो फोटो किमाणा गांव की महिलाओं की मैंने दी थी वह उस क्षेत्र में श्री चंडीप्रसाद भटृ जी द्वारा दशोली ग्राम स्वराज्य मंडल के शिविर की महिलाओं की थी इस प्रकाशित होने से रोक दें। उस दिन टेलीग्राम की लाइन ठीक थी मैंने सम्पादक जी को टेलीग्राम किया कि फोटो की न छापें, फोन करने की कोशिश भी की लेकिन सफल नहीं रहा दूसरे दिन अखबार में प्रमुखता से समाचार मय फोटो प्रकाशित हो गया।
किमाणा के दुखद समाचार फोटो सहित छपने से मेरी वैचैनी बढ़ गयी 20 वर्षो की पत्रकारिता में यह मेरी सबसे बड़ी गलती थी भगवान का शुक्र है कि किसी ने भी फोटो पर नोटिस नहीं किया अन्यथा आज के सोशल मीड़िया का जमाना होता तो अखबार और मेरी इस बड़ी गलती पर धज्जियॉ उड़ जाती।
जयदीप में सूचनाओं को भेजने में बड़ी जल्दबाजी रहती थी उद्देश्य पवित्र रहता था इसी लिये ज्यादा परेशानी भी नहीं रही। किमाणा की घटना की जानकारी जब मैंने स्वामी मन्मथन जी को दी तो उन्होंने अर्न्तराष्ट्रीय संस्था ‘सफेद चिल्डन फ्रन्ट’ इग्लैण्ड के दिल्ली दफ्तर का पता मुझे भेजा जिस पर मैंने विस्तृत विवरण तार से भेजा, फ्रन्ट के डाक्टरों का दल राहत सामग्री के साथ इग्लैण्ड से किमाणा पहुंचा लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी गोमर्ती प्रयाग के बाबा श्री माधवा ने इस दल की पूरी व्यवस्था कर यह सब जयदीप की सूचना पर ही संभव हुआ।


नन्दा देवी राजजात के मार्ग पर प्रथम
अध्ययन यात्रा बात सन् 1985 की थी मैं तब श्री नन्दादेवी राजजात समिति का सचिव था, मैंने जयदीप से चर्चा की कि नौटी से होमकुण्ड तक के श्री नन्दादेवी राजजात मार्ग पर एक अध्ययन यात्रा तुम्हारे नेतृत्व में होनी है जिसमें यात्रा मार्ग, पड़ाव की ढांचागत व्यवस्थाओं की वर्तमान परिस्थिती, लोकगीत, जागरों आदि के आधार पर तथ्यों का संकलन के साथ साथ धार्मिक महत्व पर विस्तृत रिर्पोट तैयार की जानी है पड़ाव व मार्ग से सम्बधित लोगों के साथ परामर्श कर सुझाव भी तैयार किये जाने है।
जयदीप को प्रस्ताव पसन्द आया और तय हुआ कि अक्टूबर माह के प्रथम नवरात्र दिनांक 14.10.1985 को श्री नन्दादेवी राजजात के मूल स्थान नौटी से पद यात्रा प्रारम्भ होगी और यात्रा मार्ग पर निर्धारित पड़ावों के आधार पर ईडाबधाणी, नौटी, कांसुवा, सेम, कोटी, भगोती, कुलसारी, चेयदियू, फाल्दियागांव, मुन्दोली, व बाज पड़ाव तक प्रथम चरण की यात्रा होगी तब नन्दकेशरी पड़ाव नहीं था (यह अस्थाई पड़ाव भुर्दूत के बाद के वर्षो में यात्राओं) बनाया गया दूसरे चरण की यात्रा आगामी वर्ष में होगी क्योकि वर्तमान समय में वहां पर हिमपात है।
अध्ययन यात्रा में स्व. प्रकाश पुरोहित ‘जयदीप’ के नेतृत्व में हर्षवर्द्वन नौटियाल नौटी, दिनेश जोशी मज्याडा ईडाबधाणी, वासुदेव डिमरी डिम्मर, कुशल बिष्ट ल्वाजी (मुन्दोली) शामिल थे गाजे बाजों से यात्रा मार्ग व पड़ावों पर भारी स्वागत इस अध्ययन दल का हुआ, हर्षवर्द्वन नौटियाल की अलवम से प्रादा यात्रा के कुछ फोटोग्राम संलग्न हैं।
जयदीप कमेटी की स्थलीय रिर्पोट से श्री नन्दादेवी राजजात समिति एवं शासन को काफी सुविधा हुई समिति के अध्यक्ष स्व. कुवर वलवन्त सिंह जी के नेतृत्व में सन् 1986 में (सन् 1987 की नन्दादेवी राजजात से पूर्व) पड़ाव व यात्रा मार्गो के सर्वेक्षण यात्रा हुयी। जयदीप एवं उनके साथियों के कठोर परिश्राम एवं दस्तावेजो के कारण यात्रा के इतिहास में ऐतिहासिक रहेगा।,
संयोग से गढवाल मडंल में आयुक्त के रूप में श्री सुरेन्द्र सिंह पांगती जी का मानना था कि पड़ाव व यात्रा मार्ग के गांवों की जनता के क्षमता से बाहर यात्रा व्यवस्था है, ढांचागत व्यवस्थाओं में सरकार को सहयोग करना चाहिये, 1987 की पहली श्री नन्दादेवी राजजात थी जिसमें पहली वार राज्य सरकार ने पैदलपुल व पैदल मार्गो के निर्माण के लिये 22 लाख रूपये स्वीकृत किया जो सन् 2014 की श्री नन्दादेवी राजजात में 150 करोड़ रूपये तक पहुंच गया है।                                अब तो हिमालय के इस सचल महाकुम्भ के आयोजन में राज्य सरकार महत्वपूर्ण सहयोगी बन गयी है और उसकी जिम्मेदारी में यह शामिल हो गयी है। सदियों से आयोजित होने वाली नन्दा की इस महायात्रा को इस रूप में पहुंचाने के लिये जयदीप के साथियों की यात्रा महत्वपूर्ण एवं ऐतिहासिक रही हैं। स्व. प्रकाश पुरोहित ‘जयदीप’ द्वारा पर्वतीय आपदा एवं हिमालय सचल महाकुम्भ श्री नन्दादेवी राजजात तथा अन्य क्षेत्रों में दी गयी उत्कृष्ट सेवाओं के लिये सदैव याद किया जाता रहेगा।