श्रावण मास 2018: 28 जुलाई से शुरू हो रहा सावन का पवित्र महीना, 19 साल बाद बना दुर्लभ संयोग

sawan-maas

हिन्दुओं का सबसे पवित्र महीना माने जाने वाले श्रावण (सावन) मास का शिवभक्त बेसब्री से इंतजार करते हैं क्योंकि सावन मास भगवान शिव का प्रिय महीना है। ऐसी मान्यता है कि सावन में चारों ओर मेघवर्षा होती है और तापमान में गिरावट आती है, जिससे शिव का चित्त शांत रहता है और उनके गर्म शरीर को ठंडक मिलती है।

इस साल सावन महीने की शुरुआत 27 जुलाई से हो रही है लेकिन इसे उदया तिथि यानी 28 जुलाई से मानी जाएगी। इस सावन की विशेष बात यह है कि इस बार सावन का महीना 28 या 29 दिनों का नहीं रहेगा बल्कि पूरे 30 दिनों तक चलेगा। ऐसा संयोग 19 साल बाद बन रहा है। दरअसल इस बार का सावन 30 दिनों का होने के पीछे अधिकमास पड़ने के कारण हुआ है। 28 जुलाई को सावन का पहला दिन होगा जो कि 26 अगस्त को रक्षाबंधन के दिन समाप्त होगा। पंचांग के मुताबिक, इस बार सावन के कृष्ण पक्ष में दूज दो दिन 29 व 30 जुलाई को रहेगी। पिछले साल सावन 10 जुलाई से शुरू होकर 7अगस्त तक 29 दिन का था।

इस बार सावन में इस तारीख को पड़ेंगे सोमवार:
28 जुलाई ( शनिवार) सावन का पहला दिन
30 जुलाई (सोमवार) सावन का पहला सोमवार
06 अगस्त (सोमवार) सावन का दूसरा सोमवार
13 अगस्त (सोमवार) सावन का तीसरा सोमवार
20 अगस्त (सोमवार) सावन का चौथा सोमवार
26 अगस्त ( रविवार) सावन का अंतिम दिन

 

शिव भक्तों में सावन या श्रावण महीने का खास महत्व है। इस महीने में भगवान शंकर की पूजा की जाती है। ऐसी मान्यता है कि सावन के महीने में सोमवार को व्रत रखने और भगवान शंकर की पूजा करने वाले जातक को मनवांछित जीवनसाथी प्राप्त होता है और जीवन में सुख-समृद्धि बढ़ती है। विवाहित महिलाएं यदि श्रावन महीने का सोमवार व्रत रखती हैं तो उन्हें भगवान शंकर सौभाग्य का वरदान देते हैं।
sawan-maas
सावन मास के 5 पौराणिक तथ्य:

1. मरकंडू ऋषि के पुत्र मारकण्डेय ने लंबी आयु के लिए सावन माह में ही घोर तप कर शिव की कृपा प्राप्त की थी, जिससे मिली मंत्र शक्तियों के सामने मृत्यु के देवता यमराज भी नतमस्तक हो गए थे।

2. भगवान शिव को सावन का महीना प्रिय होने का अन्य कारण यह भी है कि भगवान शिव सावन के महीने में पृथ्वी पर अवतरित होकर अपनी ससुराल गए थे और वहां उनका स्वागत अर्घ्य और जलाभिषेक से किया गया था। माना जाता है कि प्रत्येक वर्ष सावन माह में भगवान शिव अपनी ससुराल आते हैं। भू-लोक वासियों के लिए शिव कृपा पाने का यह उत्तम समय होता है।

3. पौराणिक कथाओं में वर्णन आता है कि इसी सावन मास में समुद्र मंथन किया गया था। समुद्र मथने के बाद जो हलाहल विष निकला, उसे भगवान शंकर ने कंठ में समाहित कर सृष्टि की रक्षा की; लेकिन विषपान से महादेव का कंठ नीलवर्ण हो गया। इसी से उनका नाम ‘नीलकंठ महादेव’ पड़ा। विष के प्रभाव को कम करने के लिए सभी देवी-देवताओं ने उन्हें जल अर्पित किया। इसलिए शिवलिंग पर जल चढ़ाने का ख़ास महत्व है। यही वजह है कि श्रावण मास में भोले को जल चढ़ाने से विशेष फल की प्राप्ति होती है।
4. ‘शिवपुराण’ में उल्लेख है कि भगवान शिव स्वयं ही जल हैं। इसलिए जल से उनकी अभिषेक के रूप में अराधना का उत्तमोत्तम फल है, जिसमें कोई संशय नहीं है।
5. शास्त्रों में वर्णित है कि सावन महीने में भगवान विष्णु योगनिद्रा में चले जाते हैं। इसलिए ये समय साधु-संतों, भक्तों और अन्य सभी के लिए अमूल्य होता है। यह चार महीनों में होने वाला एक वैदिक यज्ञ है, जो एक प्रकार का पौराणिक व्रत है, जिसे ‘चौमासा’ भी कहा जाता है; तत्पश्चात सृष्टि के संचालन का उत्तरदायित्व भगवान शिव ग्रहण करते हैं। इसलिए सावन के प्रधान देवता भगवान शिव बन जाते हैं।
 
लेखक का परिचय:

आचार्य हरीश चन्द्र शास्त्री
ज्योतिष चक्षु, कर्मकाण्ड विशेषज्ञ
श्री ज्वाला मालिनी ज्योतिष केंद्र, नयी दिल्ली

Acharya_Harish