सतपुली से “पंचमू की ब्वारी” का सभी देशवासियों को नव वर्ष का संदेश..!

✒️हरीश कण्डवाल ‘मनखी’ की कलम से

आजकल बिंडी दिनों बाद पंचमू की ब्वारी ने अपना सोशल मीडिया देखा। एक तो दिन छोटे हो गये, शाम को ठंड हो जाती है, ह्यूंदा बगत में काम भी बढी जाता है, भांड मजाने के लिए खिड़खिडों पानी करना पड़ता है, तब जाकर हथकुळी पर निवती आती है, नही तो ठण्डे पानी से हत्थ झड़ जाते हैं, भांड मजाने के बाद कुछ देर चुल्हे मेंं आग तापी, सासू ने भट्ट भूनकर रखे रहते हैं, कभी कभी पंचमू सतपुली से आते हुए मूंगफली और गजक ले आता है तो सरा कुटुमदरी चूल्ल के पास बैठकर खाते हैं। उसके बाद एक एक गिलास गर्म दूध पीकर चुपचाप खंतड़ी के नीचे गुण्ड मुण्ड होकर सो जाते हैं। कभी कभी पंचमू की ब्वारी मोबाईल खोलती भी है तो पंचमू गुस्सा करता है, क्योंकि उसको उजळू पर नींद नहीं आती है। आजकल पिडळूं मूळा और मिठ्ठू ज्यादा खाने से पेट में गैंस बन जाती है, जिससे पंचमू खतड़ी के नीचे का वातावरण दूषित कर देता है, जिस कारण कोई खंतड़ी के अंदर मुॅह नहीं ढक कर सो सकते हैं। उधर दिनभर फोन ऑन लाईन पढाई के चक्कर में बच्चों के पास रहता है।

ग्राम प्रधान का पति कोटद्वार से आया हुआ था तो उसन पंचमू और उसके दगड़यों को पार्टी करने के लिए बुला दिया बच्चे भी आस पडौस के कठ्ठे हो रखे थे नये साल का जश्न मनाने के लिए और सासू तो बौग मारकर सो गयी। आज पंचमू की ब्वारी के हाथ मोबाईल लगा तो उसने सोचा कि चलो सभी को नये साल की शुभकामनाये लिख देती हॅू। पहले तो छोटा सा मैसेज लिख रही थी किः-
’’ उगता हुआ सूरज रोशनी दे आपको
खिलता हुआ फूल खुशबू दे आपको
मेरी बस यही कामना है कि
नव वर्ष बेहिसाब खुशियां दे आपको’’।

लेकिन फिर सोचा कि अब ग्रीटिग कार्ड का जमाना गया, अब तो मोबाईल का सेल्फी वाला जमाना है और साथ में सोशल मीडिया तो दो चार बाते ना लिखी जाय तो नये साल का जश्न ही क्या। पंचमू की ब्वारी ने सभी देश प्रदेश वासियों को नये साल का संदेश कुछ इस प्रकार लिखाः-

सभी देश वासियों और प्रदेश वासियों के साथ-साथ देहरादून में कके सासू और कके सासू जी को विशेष तौर पर नव वर्ष 2020 की शुभकामनायें। आप सभी के लिए नव वर्ष अनेकों खुशियां लेकर आये यही कामना करती हूँ, वैसे मै तो चैत के महीने वाले नये साल को मानती हॅूं लेकिन दिखासोरी करनी पड़ती है, नहीं तो सब हमको गंवारन समझते हैं, क्या करना है जैसे नाचने वाला नाचता है वैसे ही जागर लगाने पड़ते हैं, और भौण भी वैसे ही पूजनी पडती है। साल 2020 तो कोरोना महामारी के नाम से कंलकित हो गया। इस बीमारी से सभी त्रस्त हुए, डर अलग रही। अभी भी वैसे ही डर है लेकिन अब जरा लोग कम डर रहे हैं। पहले दांव लेते बगत म्वाळू बळद के गिच्च पर लगाया जाता था लेकिन अब मनख्यूं के गिच्चों पर लग रहे हैं। कोरोना महामारी के कारण गॉव में रैवासी लौटकर आये भी थे दो चार महीने गॉव में खूब रौनक रही, नयी नयी द्यूरयाणी जिठाणियूं के साथ खूब छुई बत्थ भी हुई उनके लटके झटके भी देखे, बांझ कुड़ी के द्वार मोर खुल गये थे लग रहा था कि ये चहल पहल बनी रहेगी। लेकिन फिर जैसे जैसे लॉकडाउन में छूट मिली बस सब बिरळी के जण सुरूक सुरूक करके निकल गये, अब पैल जणी गॉव में दान सयण ही रह गये हैं।

ईधर अभी कोरोना के मामले सामने आ ही रहे हैं। देहरादून में कके सास-ससुर जी अर नणद को भी कोरोना हो गया, कके सास अर नणद तो ठीक हो गयी है। परसों ही फोन किया था, कके ससुर जी की जिकुडी में बल कुछ इंनफैक्शन हो गया तो उनको ज्यादा दिक्कत होने लगी, तब उनको दून अस्पताल से बड़े अस्पताल दिल्ली लेकर जाना पड़ा, वैसे तो कुल देवता की कृपा से कके ससुर जी राजी खुशी हैं। अभी साल भर पहले अपने गॉव आये थे तो कह रहे थे कि अब गॉव में भी सरकार ने स्वास्थ्य की सुंदर सुविधा कर दी हैं, अब पहले जैसे पीनस में ले जाने वाली बात नहीं रही, अब हर जगह अस्पताळ बन गये हैं। अब जब खुद इस निरभागी बिमारी की चपेट में आ गये तो देहरादून के अस्पताळ में भी इलाज नहीं हो पाया और दिल्ली चले गये, और अपनी भौजी यानी मेरी सासू को कहते थे कि अब तुम्हे इलाज की चितां नहीं करनी चाहिए, उत्तराखण्ड स्वास्थ्य के मामले में अब ठीक हो गया है। बस कके ससुर जी राजी खुशी तुम घर आ जाना और 2021 में कुल देवता नरसिंग के पूजन के लिए गॉव सपरिवार आ जाना।

वैसे तो यह नया साल बल विलायती नै साल है लेकिन अब जब सब यही मना रहे हैं और हम भी तो विलैती बन गये हैं। चैत बैसाख, जेठ असाड सौण भादो, असूज, कातिक, मंगसीर, पूष, माघ, फागुण ये बाराह महीने अर बंसत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमंत और शिशिर छ ऋतुओं के नाम तक हमको पता नहीं है, हम क्या जाने हिंदी नव संवत्सर मनाने की। हम तो दिखा सौरी करने की जानते हैं, बस हम भी ढिबरौं की तरह भ्यां भ्यां कर झुण्ड में चलने लगते हैं, अपने ऐथर पैथर तो कभी देखते ही नहीं है, इसलिए हमको भी अब विलैती साल को मनाना ही पडता है।

खैर जैसे भी मनाओ लेकिन भैरे 2021 में एक बार अपने गॉव में जरूर आ जाना, अपने नौन नौन्याळ लेकर आना, अपना द्वार मोर खोलकर चले जाना, जिन्होने लॉकडाउन में अपने कूड़ी के धुरपळ ठीक कर दिये वह फिर कूडू के मुडंळू के ऊपर रखा प्लास्टिक को बदलने और पलटने आ जाना, जो इस साल भी नहीं आ पाये उनके अंदर जरा भी शरम बची है तो इस साल जब मौका मिले तब आ जाना, बस यही कामना करती हॅूं कि तुम अपना मुल्क नहीं भूलना, बस कभी मंडाण लगाने तो कभी देवता पूजने या पिकनीक मनाने, किसी के शादी ब्याह के नाम पर ही सही लेकिन अपने घर गॉव आना, द्वार मोर खोल जाना, इन्ही शुभकामनाओं के साथ एक बार फिर सभी को नव वर्ष की शुभकामनाये।

 

हरीश कण्डवाल मनखी की कलम से।