क्या…? बहुरेगे महिला डेयरी कर्मियों के दिन, 24 वर्षो से संविदा पर कार्य करने को हैं मजबूर

देहरादून/पिथौरागढ़, उत्तराखण्ड़ राज्य का 9 नवम्बर को स्थापना दिवस मनाया गया, इस अवसर पर सरकार ने बड़ी बड़ी घोषणा और विकास का खाका जनता के समक्ष रखा, जब से राज्य बना तब कभी कांग्रेस तो कभी भाजपा की सरकारें सत्तारूढ़ रही, क्या हम सुदूर पर्वतीय इलाके तक विकास की किरण पहुँचा पाये, प्रश्न अभी उत्तर की प्रतीक्षा कर रहा है | हमारे हुकमरान बढ़ी बातें करते हैं और योजनाओं की जानकारी लेने विदेश तक की यात्रा कर डालते हैं,

अलग राज्य की मांग पर्वतीय जन मानस ने इसलिये की थी कि यूपी में रहकर जो विकास किरण पहाड़ों में नहीं पहुँच रही थी शायद अपना राज्य बनने के बाद पहुँच जाये और हमारे बदहाल दिन बहुरने लगे परन्तु हुआ इसके विपरीत | सड़कों का जाल बिछ गया पर चिकित्सा शिक्षा पानी और बिजली जैसी मूलभूत सुविधाओं के आज भी पहाड़ी जन राह देख रहा और हमार नीति नियंता मस्त हैं |

राज्य के विकास की बानगी की राह में खड़े 24 वर्षो से संविदा पर कार्य कर रहे महिला डेरी कर्मी आज भी कम मानदेय पर कार्य करने को मजबूर हैं | वैसे तो पूरे प्रदेश में 150 के लगभग कार्य कर रहे महिला डेरी कर्मी विभिन्न महिला डेरी समितियों के माध्यम से प्रतिदिन 22 हजार लीटर दुग्ध उर्पाजन करवाते हैं। लेकिन इतना समय बीत जाने के बाद भी आज भी ये अपने भविष्य को लेकर चितिंत हैं।

इनमें से कई उम्र के इस पड़ाव में पहुंच चुके हैं कि उनके लिये आगे की राह भी धुंधली दिखाई देती है, ये महिला डेरी कर्मी अब भी इस इंतजार में है कि उन्हें नियमित किया जायेगा और अगर नियमित न भी किया जाय तो सम्मानजनक मानदेय देकर उनके भविष्य को जरूर सुरक्षित किया जायेगा। परन्तु पिछले कई वर्षों इस आशा में कार्य कर रहे महिला डेयरी कर्मी अब उम्र के इस पड़ाव में हताश हो चुके हैं, उन्हें नहीं सूझ रहा कि वे क्या करें किस किस के पास अपना दुखड़ा रोये, उम्र के इस पड़ाव में अब आँसू भी सूख चुके हैं | परन्तु फिर भी सरकॎर की ओर टकटकी लगाये देख रहे हैं | आशान्वित
महिला डेरी कर्मी यह मानते हैं कि अब भी उनके भविष्य को लेकर सरकार कोई न कोई ठोस निर्णय लेकर सकारात्मक पक्ष के साथ सार्थक कदम उठायेगी।