उत्तराखंड में प्रवासियों के बीच “मन की बात”: राज्य स्थापना के 20 साल बाद भी अधिकांश पहाड़ी जिले अभी भी पीछे

देहरादून, COVID-19 के मौजूदा संकट में, प्रवासी श्रमिकों का मुद्दा भारत में वर्तमान समय में सबसे अधिक बहस का मुद्दा रहा है। प्रवासियों की समस्याओं के सार्थकता के मद्देनजर एक अंतर्राष्ट्रीय वेबिनार का आयोजन पंडित दीन दयाल उपाध्याय एक्शन एंड रिसर्च सोसाइटी देहरादून और प्रभाव व नीति अनुसंधान संस्थान नई दिल्ली द्वारा संयुक्त रूप में किया गया।इस माह 20 व 21 जून, 2020 को हुये इस वेबिनार में भारत और विदेश से कई विशेषज्ञों ने इस महत्वपूर्ण विषय पर प्रस्तुति दी और चर्चा की गई। उत्तराखंड के पहाड़ी जिलों में लौटे 323 प्रवासी श्रमिकों के बीच किए गए एक टेलीफोनिक सर्वेक्षण के निष्कर्षों पर चर्चा के अलावा, पैनलिस्ट ने राष्ट्रीय स्तर के अंतर-राज्य प्रवास के साथ-साथ अंतर्राष्ट्रीय प्रवास पर कई मुद्दों पर चर्चा की।
प्रभाव व नीति अनुसंधान संस्थान की सीईओ और संपादकीय निदेशक डॉ0 सिमी मेहता ने इस विषय को पेश किया और देश में कोविड -19 और लॉकडाउन के बीच प्रवासियों की दुर्दशा पर प्रकाश डाला।
प्रोफेसर बलवंत सिंह मेहता, इंस्टीट्यूट फॉर ह्यूमन डेवलपमेंट (IHD), ( दिल्ली ) ने विश्व मे हो रहे प्रवास , राष्ट्रीय और स्थानीय प्रवास के बारे में चर्चा की और कहा कि अंतर्राष्ट्रीय प्रवास में भारत सबसे ऊपर है जो कि दुनिया में कुल 272 मिलियन प्रवासियों में से 6.5% (18 मिलियन) हैं।
उत्तराखंड प्रवासियो़ के तथ्यों के बारे में बात करते हुए,उन्होंने कहा कि राज्य को उत्तर प्रदेश से सन् 2000 में पूर्व वर्ती राज्य के पहाड़ी क्षेत्रों को विकसित करने के एजेंडे के साथ बाहर किया गया था, लेकिन इसकी स्थापना के 20 साल बाद भी, अधिकांश पहाड़ी जिले अभी भी पीछे हैं | राज्य के 10 पहाड़ी जिलों और 3 मैदानी जिलों के बीच भारी आर्थिक विषमता और असमानता है। परिणाम स्वरूप बड़ी संख्या में पहाड़ी जिलों के लोग बेहतर आजीविका के अवसरों के लिए राज्य के बाहर या राज्य के अन्य स्थानों पर आजीविका के अवसरों के लिए प्रवास करते हैं। 2011 की जनगणना के आंकड़ों से पता चलता है कि 734 गांवों में से ज्यादातर पहाड़ी इलाके,2011 के बाद निर्जन हो गए हैं, ऐसे निर्जर गाँवों को घोस्ट गांवों के रूप में भी जाना जाता है। वर्तमान में चल रहे महामारी कोविड -19 और लॉकडाउन अवधि के दौरान,हमने प्रवासियों के दुखों का अनुभव किया है, उनका भारीभरकम समान को अपने सिर पर ले जाना, भूखा और थका हुआ होना,केवल अपने मूल स्थानों पर लौटने के लिए लगातार मार्च करना, यह हमें जिंदगीभर याद रहेगा।अंत में, दो महीने के राजनीतिक ड्रामा के बाद, लगभग 62 मिलियन प्रवासी जिन्होंने पंजीकरण कराया था उनमे से ही कई अन्य अब राज्यों में लौट आये हैं, उन्हें अब एक नई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। इन्हें अपने भविष्य के बारे में पता नहीं है, ये लोग पिछले दो महीनों के दौरान लॉकडाउन की यादों और कठिनाइयों का सामना करते हुए आगे क्या जीवन जिएंगे इसका कुछ कहा नही जा सकता, वे इस के बारे में चिंता करते हुए दिन और रात बिता रहे हैं। इसी संदर्भ में, उत्तराखंड में उनकी जीविक और आजीविक चुनौतियों को समझने के लिए 321 प्रवासियों के बीच एक टेलीफोनिक सर्वेक्षण किया गया था, जहां पिछले एक महीने की अवधि में 1 लाख से अधिक प्रवासी पहाड़ी जिलों में लौट आए हैं।
डॉ. मनोज कुमार पंत, अतिरिक्त मुख्य कार्यकारी अधिकारी, सेंटर फॉर पब्लिक पॉलिसी एंड गुड गवर्नेंस, उत्तराखंड ने ग्रामीण क्षेत्रों में सेंटर फॉर पब्लिक पॉलिसी और गुड गवर्नेंस फॉर जॉब के प्रयासों को विस्तार से बताया। उन्होंने बताया कि रोजगार प्रोत्साहन के लिए राज्य द्वारा 5 प्रमुख क्षेत्रों की पहचान की गई है। जिसमे: जैविक खेती, बागवानी, पर्यटन, आयुष, वानिकी और बिजली उपलब्ध कराने जैसे प्रयास शामिल हैं। उन्होंने राज्य में विकासशील शिक्षा और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं की आवश्यकता पर भी जोर दिया।
प्रोफेसर आई सी अवस्थी, आई0एच0डी, दिल्ली ने सर्वेक्षण की खोज पर प्रकाश डाला और कहा कि उत्तराखंड में सभी संसाधनों को पहाड़ी छेत्रो से निचले छेत्रो में खींच लिया जाता है। राज्य में पहाड़ी व निचले छेत्रो में असमान संबंध के परिणाम स्वरूप आय असमानता देखने को मिलती है। कारणवश मैदानी जिलों की तुलना में पहाड़ी जिले स्पष्ट रूप से नुकसान की स्थिति में हैं। सर्वेक्षण के निष्कर्षों पर, उन्होंने वापसी प्रवासियों पर कोविड महामारी के गंभीर प्रभाव को बताया। 321 प्रवासियों में से लगभग दो तिहाई कुमाऊं क्षेत्र से थे और एक तिहाई गढ़वाल क्षेत्र से। उनमें से अधिकांश पुरुष प्रवासी थे (90%) और केवल 10% महिलाएं राज्य में पुरुष प्रधान प्रवास को दर्शाती हैं। 10 प्रवासियों में से 7 , 15-29 वर्ष के युवा थे और 10 में से 3 30-49 वर्ष के मध्य आयु के , जो राज्य में युवा संकट और उच्च बेरोजगारी का संकेत देते हैं। प्रमुख प्रवास स्थल महाराष्ट्र मुख्य रूप से मुंबई (39%) से थे, इसके बाद दिल्ली एन सी आर (10%), राजस्थान (7%) थे। अधिकांश कम वेतन और पारिश्रमिक के साथ निजी कंपनियों में कुक और वेटर,सिक्योरिटी गार्ड आदि के रूप में कम वेतन वाली नौकरियों (81%) में व्यस्त थे। प्रो0 अवस्थी ने इस बात पर भी प्रकाश डाला कि अधिकांश प्रवासी (68%) अपने मूल स्थानों पर रोजगार के अवसरों के अभाव में अपने गंतव्य स्थानों पर वापस जाना चाहते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि प्रवासियों का एक छोटा हिस्सा मुख्य रूप से सरकारी योजनाओं के बारे में जागरूकता की कमी रखता है। उन्होंने कहा कि उत्तराखंडियों के लिए प्रवासी आयोग की भूमिका इस स्थिति में महत्वपूर्ण है ताकि स्थाई आजीविका के अवसर पैदा कर के प्रवासियों का पुनर्वास किया जा सके।