देवभूमि उत्तराखंड में सर्दियों को बनाएं ख़ास

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सर्दियों का मौसम शुरू होते ही अक्सर हम रोमांच से भर जाते हैं और उस पर बर्फ की कल्पना जिस से हो जाते हैं रोंगटे खड़े और ऐसे में मन होता है कि निकले सेर सपाटे पर और बनाएं सर्दियों को कुछ ख़ास, कुछ यादगार। ऐसे मौसम में अपकी तमन्ना पूरी कर सकता है देवभूमि उत्तराखंड के कुछ अनोखे और रोमांच से भरे ये स्थान। विशाल हिमालय, बर्फीली चोटियां, लहलहाती नदियाँ, चटक खिलखिलाती धुप, प्राचीन मंदिर, मनभावन पगडंडियाँ आदि अनेकों ऐसे अनुभव जो आपकी यात्रा को बना देंगे शानदार। यहाँ के पारंपरिक व्यंजन जो आपको देंगे पौष्टिकता के साथ-साथ स्वाद का अद्भुत एहसास। हलकी गुनगुनी धुप और पहाड़ के नज़ारों से मिलेगा ख़ास एहसास जो लगाएगा आपकी यात्रा में चार चाँद। सर्दियों में यहां हैं कुछ खास प्रमुख स्थान जो नही करेंगें आपको निराश। अगर आप प्रकृति प्रेमी हैं और थोड़ा बहुत trek कर सकते हैं तो निश्चित रूप से आप एक नई स्फूर्ति का संचार पाएंगे। यहां प्रस्तुत है उत्तराखंड की कुछ प्रमुख शीतकालीन destination.

हरिद्वार बद्रीनाथ highway पर स्थित जोशीमठ से 12 km की दूरी पर बसा है औली बुग्याल (घास का मनभावन मैदान)। उत्तराखंड का प्रसिद्ध एवं skiing मैदान, जो सर्दियों में होता है बर्फ से लबालब। यहाँ सर्दियां पर्यटकों से होती है गुलज़ार। प्रत्येक वर्ष हज़ारों की तादाद में यहाँ आने वाले पर्यटक करते हैं अपने सपनों को साकार, और करते हैं बर्फ के साक्षात् दर्शन। पूर्व में सूर्योदय के साथ कीजिये दर्शन नंदा देवी के और उत्तर में मिलता है आपको sleeping beauty जैसी चोटियों का अद्भुत नज़ारा। यहाँ से 9 km की दूरी पर है गोरसों बुग्याल जिसे trek से ही संपन्न किया जा सकता है, और जो बना देता है आपकी यात्रा को को और भी रोमांचक। यहाँ GMVN द्वारा संचालित केबल कार भी है जो जोशीमठ से औली तक संपूर्ण मार्ग का रोमांचक अनुभव प्रदान कराती है। जोशीमठ में रुकने ठहरने के लिए तमाम सुविधाए मौजूद हैं। यहीं पर है भगवान् श्री नरसिंह देवता जी का प्रसिद्ध मंदिर जहां श्री बद्रीनाथ जी का शीतकालीन गद्दीस्थल है। और यहीं से 10 km की दूरी पर है अलकनंदा और धौलीगंगा का मिलन केंद्र जिसे विष्णुप्रयाग के नाम से जाना जाता है। अलकनंदा नदी माना घाटी से, और धौलीगंगा नीति घाटी से बहते हुए यहीं पर अपना संगम बनाती है। जोशीमठ से मलारी वाले रूट पर भी आप एक्स्प्लोर कर सकते हैं जिसे नीति घाटी कहते हैं और यह भारत चीन बॉर्डर पर ख़त्म होता है। यहाँ की प्रसिद्ध राजमा दाल व् आलू निश्चित रूप से आपको खूब भायेंगे।

 

कैसे पहुंचे औली ?

औली के लिए निकटतम airport जॉलीग्रांट देहरादून है जो कि राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से 248 km की दूरी पर है। इसके नज़दीक ही ऋषिकेश है जहां से जोशीमठ के लिए बस व टैक्सियां उपलब्ध हैं। ऋषिकेश से जोशीमठ की दूरी लगभग 238 km है जो कि दिन में ही पूरी करनी होती है। पहाड़ी मार्ग होने के कारण आपको रात में सफर करने की इज़ाज़त नही होती है। हरिद्वार नज़दीकी रेलवे स्टेशन है जो की जोशीमठ से 250 km की दूरी पर स्थित है। औली सभी प्रमुख स्टेशनो से जुड़ा हुआ है और सभी प्रमुख स्टेशनों से यहां के लिए गाड़ियां उपलब्ध हैं।

तृतीय केदार तुंगनाथ, पंच केदारों में सबसे ऊंचाई 3460 mtr पर बसा भगवान शिव का प्रमुख धाम है जो कि रुद्रप्रयाग जिले के चोपता से 3 km की पैदल दूरी पर है। गर्मियों के मौसम के साथ साथ यह धाम सर्दियों में भी प्रकृति प्रेमीयों को अपनी ओर आकर्षित करता है। और यहीं से 2 km आगे तुंगनाथ चोटी जिसे चंद्र शिला के नाम से जाना जाता है, मन आनंदित कर देने वाला स्थान है जहां से अक्सर हिमालय की सभी ऊंची चोटियों के दर्शन मन को छू लेते हैं। कहा जाता है कि रावण वध में बाद भगवान श्री राम ने ब्रह्महत्या से मुक्त होने के लिये यहीं पर तप किया था। यूँ तो भगवान तुंगनाथ के कपाट मई महीने से अक्टूबर महीने के बीच ही खुलते हैं परन्तु पर्यटक या श्रद्धालुऔं को यह स्थान सर्दियों में भी अपनी ओर खींचने पर मजबूर कर ही देता है। पैदल मार्ग में आपको प्राकृतिक छटा के बीच कस्तूरी मृग व मोनाल आदि जंगली पक्षियों को देखने का सौभाग्य भी प्राप्त होता है। इस trek में सबसे खास अगर कुछ है तो वह है प्रातःकाल का सूर्य दर्शन। चंद्रशिला का सूर्योदय आपके अनुभव को अनुपम बना देता है। चोपता में मूलभूत सुविधाओ के साथ साथ ठहरने की भी व्यवस्था है। विकल्प में तौर पर उखीमठ को भी देखा जा सकता है, यहां लगभग सारी व्यवस्था उपलब्ध हैं। पैदल मार्ग हल्की चढ़ाई के साथ साथ काफी सुगम है, जो कि प्राकृतिक सौन्दर्य का अद्वितीय आनंद देता है। सर्दियों में निश्चित रूप से आपका सामना बर्फ से होता है जिसमे मार्ग थोड़ा तंग हो सकता है। मौसम खराब होने पर आप हिमपात के साक्षी भी बन सकते हैं, जो कि काफी लोगों की आकांक्षा को परिपूर्ण करता है।

 

कैसे पहुंचे तुंगनाथ चोपता?

तुंगनाथ चोपता दिल्ली से सीधे बस से भी पहुंचा जा सकता है। उत्तराखंड परिवहन की बस समय समय पर दिल्ली से हरिद्वार होते हुए श्रीनगर रुद्रप्रयाग आती हैं जहां से अन्य सेवा बस, टैक्सी आदि से चोपता पहुंचा जा सकता है। हरिद्वार से चोपता की दूरी मात्रा 184 km है। अन्य स्थान से हरिद्वार आसानी से विभिन्न माध्यमों से पहुंचा जा सकता है जो की चोपता के लिए नज़दीकी रैलवे स्टेशन भी है । By Air के लिए नज़दीकी airport जॉलीग्रांट है जो कि चोपता से 179 km की दूरी पर है।

ब्रह्मताल चमोली ज़िले के लोहाजंग से 8 km की पैदल दूरी पर स्थित एक ताल है जो कि सर्दियों में अक्सर जम जाती है। लोहाजंग हरिद्वार से 275 km कि दूरी पर स्थित है। ऋषिकेश से सीधी बस व टैक्सी उपलब्ध हैं। लोहाजंग व देवाल में ठहरने का विकल्प देखा जा सकता है। हिमपात के शौक़ीन यहाँ हिमपात का आनंद ले सकते हैं। मौसम का मिजाज बिगड़ते ही यहाँ बर्फवारी होने लगती है। औसत पर्यटक आने से यहाँ का वातावरण अपनी प्राकृतिक सुन्दरता को बरकरार रखे हुए है, आप चाहें तो विभिन्न trekking agency कि मदद से भी यहाँ पहुँच सकते हैं। लोहाजंग में भी लोकल गाइड उपलब्ध हैं। लोहाजंग तक का रास्ता भी sight seeing के तौर पर अच्छा ख़ासा अनुभव देता है। हरिद्वार ऋषिकेश देवप्रयाग श्रीनगर कर्णप्रयाग थराली आदि ख़ास जगहों को भी एक्स्प्लोर कर सकते हैं। लोहाजंग एक छोटा सा सुंदर गाँव है जो 3704 mtr कि ऊंचाई पर बसा हुआ है, यह दर्जन भर गाँवों का छोटा बाज़ार है जहां से लोग अपनी जरूरत का सामान खरीदते करते हैं। विश्व कि सबसे बड़ी धार्मिक एवं अध्यात्मिक नंदा देवी राज जात यात्रा यंही से होकर गुजरती है जो अंत में रूपकुंड होते हुए होमकुंड में संपन्न होती है।

ब्रह्मताल camping के लिए भी प्रसिद्द है, आये दिन आप यहाँ टेंट के साथ काफी पर्यटकों को पाएंगे। camping का अनुभव काफी रोमांचक और प्रकृति के साथ करीबी रिश्ता जोड़ने वाला होता है। बर्फ में चलने कि सरसराहट, बाँझ, बुरांश व् देवदार के जंगल बुग्याल के साथ मिलकर एक अलग ही अनुभव बयान करते हैं। रास्ते में दिखते मृग यहाँ से दिखने वाली हिमालय कि ऊंची हिमाच्छादित चोटियाँ समा बाँध देती हैं। यहाँ का सूर्योदय और सूर्यास्त दोनों ही अनुपम अनुभव प्रदान करते हैं मानो सूर्य और हमारे बीच कोई है ही नहीं। रात में दिखने वाले तारे मानो आज तक इतने नज़दीक कभी आये ही ना हों, चाँद कि इतनी स्पष्टता मानो कभी थी ही नहीं। टेंट में पड़ती चाँद कि रौशनी बर्फ से टकराकर जो मानो लौटने को राज़ी ही ना हो। एक अद्भुत नज़ारा एक बेहतरीन अनुभव जो आपको बारम्बार यहाँ आने के लिया आपको मजबूर कर दे।

ब्रह्मताल पैदल पैदल मार्ग हल्की चढ़ाई से युक्त रास्ता है जिसमे थोडा प्रयास व धैर्य कि आवश्यकता है पर यह मार्ग बदले में आपके प्रयास को किसी आजीवन संभाले रखे जाने वाले अनुभव में परिवर्तित कर पुरस्कृत करता है। यहाँ आने वाले हर सैलानी का सुखद अनुभव बताता है कि वे किस हद तक तृप्त हुए हैं।

 

कैसे पहुंचे ब्रह्मताल?

ब्रह्मताल के लिए नजदीकी मोटरमार्ग लोहाजंग है और लोहाजंग सभी महत्वपूर्ण स्थानो से भलीभांति जुडा है। यह चमोली जिले में स्थित है और हरिद्वार व हल्द्वानी दो मुख्य द्वार यहाँ के लिए खुलते हैं, दोनों शहर नजदीकी रेलवे स्टेशन भी हैं। हवाई मार्ग के लिए नजदीकी एअरपोर्ट Jollygrant का विकल्प लिया जा सकता है। हरिद्वार से लोहाजंग कि दूरी 275 km व हल्द्वानी से 220 km है। दिल्ली से हल्द्वानी होते हुए यह दूरी 528 km और हरिद्वार होते हुए यह दूरी 491 km हो जाती है।

 

हर कि दून

हर कि दून 25 km का trek है जो उत्तरकाशी जिले के 3550 mtr कि ऊंचाई पर बसा सालभर खुला रहने वाला trek है। अपने अप्रतिम सौंदर्य के लिए जाने जाना वाला यह trek सर्दियों में आपको एक स्वर्ग जैसी अनुभूति कराएगा, हल्की फुल्की चढ़ाई और ढलान के साथ वन्यजीव और वनस्पति (flora and fauna) को देखने समझने का वातावरण आपको प्रकृति के और भी समीप ले जायेगा। Beginners के तौर पर भी यह trek आदर्श है। हर कि दून trek शुरू होता है सांकरी गाँव से जो कि दिल्ली से 431 km और राज्य राजधानी देहरादून से 186 कि दूरी पर स्थित है। यह दिल्ली देहरादून होते हुए मसूरी पुरोला नौगाँव मोरी नेतवार जैसी सुंदर जगहों के बीच आपको एक बेहतरीन sight seeing भी देता है। सांकरी से आगे तालुका गाँव तक नयी रोड का निर्माण हो चुका है जिससे trek कि दूरी काफी कम हो गयी है। सांकरी के लिए देहरादून व मसूरी से बस व टैक्सी उपलब्ध हैं, सुबह निकलना उत्तम रहेगा क्योंकि पहाड़ी मार्ग होने के नाते रात को सफर कि मनाही होती है। चीड देवदार बुरांश के घने जंगल के बीच बुग्याल और छोटी-छोटी नदियाँ, ताल आदि से मन प्रफुल्लित हो जाता है। यहाँ से दिखने वाली हिमालय की बर्फ से ढकी चोटियाँ खासकर बंदरपूछ और स्वर्गारिहिनी देखते ही बनती है। सांकरी से चलते ही रुपिन नदी आपका स्वागत करते नहीं थकती।

बीच में पड़ने वाला ओसला और सीमा गाँव आपको सीमांत गाँव का अद्भुत अनुभव प्रदान कराते हैं। यहाँ मिलने वाली पारंपरिक व लज़ीज़ भोज आपको एक अलग ही स्वाद का परिचय कराते हैं। राज्य पुष्प ब्रह्मकमल का दृश्यावलोकन सचमुच में हृदय को पुलकित करने वाला है। रात्री को टिमटिमाते तारे मानो आपसे वार्तालाप को व्याकुल हो उठे हों। चाँद की रौशनी में नहाए बर्फ की चोटियाँ मानो आपकी सारे दुखों को हरने की पुरजोर कोशिश में लगी हो। अद्भुत, अद्वितीय, अनुपम हृदय को सुकून देने वाला यह tek निश्चित रूप से आपको अन्दर से ऊर्जा से भर देगा, जिसे आप ताउम्र संजो कर रखना चाहेंगे।

कैसे पहुंचे हर की दून?

हर की दून के लिए नजदीकी मोटर मार्ग सांकरी है हालांकि अब रोड तालुका गाँव तक बन चुकी है तो तालुका से पैदल यात्रा प्रारम्भ की जा सकती है। तालुका से यह दूरी लगभग 24 km trek द्वारा संपन्न की जाती है। नजदीकी रेलवे स्टेशन देहरादून है जो की 184 की दूरी पर है, नज़दीकी airport भी जोलीग्रांट देहरादन ही है। देहरादून व मसूरी से सीधी सेवाएँ सांकरी गाँव तक बस व टैक्सी के माध्यम से ली जा सकती है। दिल्ली से सांकरी 431 km की दूरी पर है। सांकरी व मोरी भी ठहराने के विकल्प देते हैं।

 

नाग टिब्बा

नाग टिब्बा 3022 mtr की ऊंचाई पर 8 km का बहुत ही खूबसूरत trek है जो कि टिहरी जिले के पंतवारी गाँव से शुरू होता है। पंतवारी गाँव देहरादून से 90 km की दूरी पर स्थित है जिसके बीच में मसूरी, केम्पटी फॉल, यमुना ब्रिज, नैनबाग आदि खूबसूरत स्थानों के दर्शन होते हैं। देहरादून से दिल्ली सिर्फ 250 km की दूरी पर है। क्षेत्रीय भाषा में नाग टिब्बा का अर्थ “नाग देवता की छोटी” से है और नाम के ही अनुरूप यहाँ एक बहुत सुंदर नाग देवता का मंदिर भी अपनी सुन्दरता बिखेरे हुए है। बाँझ, बुरांश देवदार से युक्त यह trek रोमांच के शौकीनों को बहुत ही आकर्षित करता है, साल भर खुला रहने वाला यह trek सर्दियों में बर्फ से लाबालब हो जाता है। यहाँ से दिखने वाली हिमालय की ऊंची चोटियाँ समा बाँध देती हैं। सुबह 5 या 6 बजे निकलने पर trek एक दिन में भी पूरा किया जा सकता है। पर कैम्पिंग कर रात गुज़ारने का अनुभव बहुत मायने में ख़ास होता है। बर्फ पर पड़ती सूरज की पहली किरण शब्दों में कहाँ बयाँ हो पाती है। हिमाच्छादित पहाड़ के बीच में चारों और से चाँद की रौशनी में नहाए हुई चोटियाँ और जंगल के बीच में लगे कैंप के समीप जलता अलाव आखिर किसके दिल को नहीं भायेगा। ऐसे ही अनगिनत अनुभव से भर देगा आपको यह नाग टिब्बा का trek जो कम समय में अधिकतम अलौकिक प्राकृतिक छटा से साक्षात्कार कराता है। यदि समय की कमी हो और कैम्पिंग का मन हो तो यह trek आपके लिए सर्वोत्तम साबित हो सकता है।

कैसे पहुंचे नाग टिब्बा?

नाग टिब्बा के लिए देहरादून या मसूरी पहुंचना जरूरी है जो की दिल्ली से 250 km की दूरी पर है। यहाँ से बस व टैक्सी ली जा सकती हैं। नजदीकी रेलवे स्टेशन व हवाई अड्डा दोनों देहरादून ही है। गाइड पोर्टर अथवा ट्रैकिंग एजेंसी की मदद भी ली जा सकती है जो की मसूरी व पंतवारी गाँव में भी उपलब्ध है। पंतवारी गाँव के अतिरिक्त नाग टिब्बा के लिए एक और मार्ग है जो देवलसारी से होकर गुज़रता है थोडा तंग होने के कारण यह trek कम लोकप्रिय है। हिमपात के लिए जनवरी फ़रवरी का महीना सर्वोत्तम है। मौसम के करवट लेते ही हिमपात के साक्षी बनने की पूर्ण संभावना भी रहती है।

 

Written By – Bhupendra Singh Bisht, Founder The Last Mountain

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**लेखक thelastmountain.in (THE LAST MOUNTAIN) के संस्थापक व संचालक हैं. संपूर्ण जानकारी लेखक के निजी अनुभव पर आधारित है।