पंच केदारों में सबसे कठिन और मनमोहक यात्रा है द्वितीय केदार मध्यमहेश्वर की

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मार्कंडेय गंगा व मध्यमहेश्वर के जल विभाजक के पूर्वी ढ़लान पर बाबा मध्यमहेश्वर का भव्य मंदिर स्थित है, जो कि प्राकृतिक सुंदरता के दृष्टिकोण से पंच केदारों में सर्वाधिक आकर्षक है। मंदिर शिखर स्वर्ण कलश से अलंकृत है। मंदिर के पृष्ठभाग में कालीमठ व रांसी की भाँति हर-गौरी की आकर्षक मूर्तियाँ विराजमान हैं, साथ ही छोटे मंदिर में पार्वती जी की मूर्ति विराजित है।

मध्यमहेश्वर से २ किमी । के मखमली घास व पुष्प से अलंकृत ढालों को पार कर बूढ़ा मध्यमहेश्वर पहुँचा जाता है। यहाँ पर क्षेत्रपाल देवता का मंदिर भी है, जिसमें धातु निर्मित मूर्ति विराजित है। इसी से आगे ताम्रपात्र में प्राचीन काल के सिक्के भी रखे हैं। बुढ़ामध्यमहेस्वर बुग्याल में एक सुन्दर झील है जिस में चौखम्बा पर्वत का प्रतिविम्ब दिखता है। यहाँ भोजपत्र के कई पेड़ हैं साथ में सफ़ेद फूल वाला बुरांस। हिमालयी मोनाल के लिए यह बेहतरीन स्थान है। मध्यमहेश्वर से ही नंदी कुंड, काछिन ताल और पांडव सेरा ट्रेक का रास्ता है।

यहाँ पहुंचने के लिए शुरू में दिल्ली से ऋषिकेश, गढ़वाल श्रीनगर, रुद्रप्रयाग, उखीमठ पहुंचा जाता है। यहाँ से रांसी गाओं तक वाहन से जाने के बाद पैदल यात्रा करनी पड़ती है। इस रास्ते में अन्तिम गांव गोंडार है जो मार्कण्डेय गंगा एवं चौखम्बा जल धाराओं के संगम पर बसा है। इसके बाद नौ मील की चढ़ाई का रास्ता है। रास्ते में बनतोली व नानू पड़ते हैं जहा आप ठहर सकते हैं। मध्यमहेश्वर में ठहरने की सुविधा है। आप इस सुरम्य घाटी में अवश्य प्रकृति का आनंद लेने जाएं।

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