गाँधी देखो तुम्हारे चेले कितनी मौज में हैं….!

✒️ डॉ० प्रकाश उप्रेती

तुम हाड़-मांस की काया के भीतर थे लेकिन तुम्हारे चेले उसके बाहर हैं। इस देश में सबसे आसान और सबसे कठिन गाँधी-वादी बनना है। अगर गाँधी का मतलब नैतिक बल, स्वयं को संशोधित करना, आचरण की शुद्धता है तो वो सबसे मुश्किल है लेकिन अगर 260 रुपए का कुर्ता, 90 रुपए का पजामा, 40 रुपए की टोपी, 50 रुपए का झोला और कोल्हापुरी चप्पलों का अर्थ ही गाँधी- वादी होना है तो सबसे आसान है। मुझे पता है गाँधी तुम भी अब इस दूसरी जमात वाले लोगों को ही चाहते हो।
आज तुम्हारे चेले इसी जमात के तो हैं। अगर ऐसा नहीं होता तो वो वहाँ नज़र आते जहाँ किसान आंदोलन कर रहे हैं, जहाँ एक माँ अपनी बेटी के लिए आँचल फैला रही है, जहाँ भात-भात कहते हुए एक लड़की प्राण त्याग देती है, जहाँ सैकडों मजदूर सड़कों पर थे, जहाँ महामारी में इलाज के लिए लोग तड़प रहे थे, जहाँ एक- दूसरे समुदाय पर बंदूकें तनी हुई थी, जहाँ शिक्षा के लिए हजारों छात्र सड़कों पर थे लेकिन तुम्हारे चेले इनमें से कहीं नहीं थे।

वह थे तो बस किसी टीवी की डिबेट, विश्वविद्यालय के वातानुकूलित चैम्बर, भव्य इमारतों के अंदर और शिमला, मनाली जैसी ठंडी जगहों पर, उनको यहीं तो होना था। उनके लिए गाँधी-वाद का मतलब शांति ही तो है जिसे वो ‘पीस’ के रूप में देखते हैं। सच कहो, अगर तुम होते तो कहाँ होते, शिमला में या सड़कों पर ? हवेलियों में या हाथरस में ? राजघाट पर या सीलमपुर में ?
गांधी, तुमको पता है 2 अक्टूबर को तुम्हारी जयंती! पर पुष्प-वर्षा होगी, धूल खाती तुम्हारी समाधि को पोंछ दिया जाएगा। अगल-बगल के कांटे उखाड़ दिए जाएंगे। कुछ समय मौन होगा उसके बाद चीख़। तुम कल अचानक हर आत्मा में प्रकट हो जाओगे और सबसे ज्यादा छली, प्रपंची, झूठा, हिंसक, अनैतिक व्यक्ति तुम पर सबसे लंबा व्याख्यान देगा। तुम उसकी आत्मा में समा जाओगे। उसके व्याख्यान से ऐसा भान होगा कि-
“आ साजन मोरे नयनन में, सो पलक ढाप तोहे दूँ।
न मैं देखूँ औरन को, न तोहे देखन दूँ।।”

ऐसा व्यक्ति एक नहीं कई जगह तुम पर बोलेगा। हर जगह उसका परिचय तुमसे होगा जैसे- गाँधीवादी चिंतक, गाँधी विचारक, गाँधी के जानकार, गाँधी पर किताब लिखने वाले लेखक, गाँधी के नाम पर बनी संस्था के निर्देशक, गाँधी के अध्येता, गाँधी को पढ़ाने वाले, गाँधी कुर्ता पहनने वाले आदि अनादि। जब-जब उसका यह परिचय दिया जाएगा तो उसकी बाँछे खिल जाएंगी। गाँधी, तुम भी तो यही चाहते हो न? सच कहो…

“तुम्हारी जयंती..! तुम पर पुष्प-वर्षा होगी, धूल खाती तुम्हारी समाधि को पोंछ दिया जाएगा। तुम कल अचानक हर आत्मा में प्रकट हो जाओगे और सबसे ज्यादा छली, प्रपंची, झूठा, हिंसक, अनैतिक व्यक्ति तुम पर सबसे लंबा व्याख्यान देगा।”

गाँधी, तुमको पता है, तुम्हारे सपनों का भारत अभी तक जागा ही नहीं है। वैसे भी जाग कर करना क्या है! सपने में रहने से कम से कम सोए हुए का भ्रम तो बना रहता है। जाग गए तो यह भ्रम भी टूट जाएगा। क्यों तुम भी यही चाहते हो न? सच- सच कहो गाँधी इसके बाद भी तुमको अपनी जयंती से डर नहीं लगता है..