रिवर्स माइग्रेशन: कैसे उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्र के वीरान गांव फिर से आबाद हो सकते हैं ?

उत्तराखंड, विगत दो दशकों में या यूँ कहें कि राज्य गठन के बाद उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्र के गांव तेज़ी से पलायन के भेंट चढ़े हैं। पलायन से कई गांव वीरान हो चुके हैं। परन्तु इस कोविड-19 महामारी के चलते बहुत से प्रवासी अपने-अपने गांव की ओर लौट रहें हैं और कुछ प्रवासी स्थिति सामान्य होने के बाद फ़िर से यहीं बसना चाहते हैं । हाल के कुछ वर्षों में राज्य सरकार ने पलायन की समस्या को गंभीरता से लिया है और सरकार इसे रोकने के लिए कुछ प्रभावी कदम भी उठा रही है। कुछ निजी संस्थाएं भी इस दिशा में उल्लेखनीय कार्य कर रही हैं।

पलायन रोकने और रिवर्स माइग्रेशन के लिए राज्य सरकार द्वारा गठित पलायन आयोग की रिपोर्ट के सार्वजानिक होने पर जो आंकड़े सामने आए थे उसमें आजीवका के साधनों की कमी की वजह से सबसे ज्यादा पलायन हुआ है। शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं के आभाव ने भी लोगों को अपना गांव छोड़ने को मजबूर किया है। राज्य के पर्वतीय क्षेत्रों से निकलकर लोग राज्य के मैदानी क्षेत्रों मुख्यतः देहरादून, हरिद्वार एवं हल्द्वानी, देश के दूसरे राज्यों तथा विदेशों में जाकर बसे हैं । कई गांव बिल्कुल खाली हो चुके हैं और कुछ गांव में 10 से भी कम लोग बचे हैं जोकि आए दिन जंगली जानवरों के आतंक से परेशान रहते हैं। उक्त रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2018 तक राज्य के लगभग 1700 गांव बिल्कुल खाली हो चुके हैं इन गांव को अब घोस्ट विलेज कहा जा रहा है।

चूंकि यह समय प्रवासी युवाओं और राज्य सरकार के लिए ऐसा अवसर लाया है जिसे ब्लेसिंग इन डिस्गाइज़ (अप्रत्यक्ष कृपादान) के रूप में भी देखा जा सकता हैं। इस महामारी से निजात पाने के बाद उत्तराखंड को पलायन की त्रासदी से भी बचाया जा सकता है क्योंकि अभी राज्य सरकार भी पलायन को रोकने के लिए गंभीर है और प्रवासी युवाओं को यहाँ रहकर अपने लिए आजीविका भी सुनिश्चित करनी है। इसलिए स्थिति सामान्य होते ही राज्य सरकार और प्रवासी युवाओं को एक दूसरे के सहयोग से आगे बढ़ना चाहिए । राज्य सरकार को इस दिशा में सरकार द्वारा चलाई जा रही योजनाओं को प्रभावी तौर से लागू करवाना चाहिए और ज़रूरत पड़ने पर नई योजनाओं पर अमल करना चाहिए, ताकि इन प्रवासी युवाओं को आगे भी पलायन के लिए मजबूर ना होना पड़े। अतः राज्य सरकार को इस मौके का भरपूर लाभ उठाकर वीरान पड़े पर्वतीय क्षेत्र के गावों को फिर से आबाद करने का पूर्ण प्रयास करना चाहिए। जितनी भी कृषि भूमि क्षेत्र एक परिवार के स्वामित्व में है उसमें खेती-बाड़ी की जा सकती है। कुछ नहीं तो भोजन जैसी मूलभूत आवश्यकता तो इससे पूरी हो ही सकती है। साथ-साथ बाकि अन्य व्यवसायों को अपनाकर अपनी आजीविका को सुनिश्चित किया जा सकता है।

प्रवासी युवाओं की सरकार से अपेक्षाएं हैं कि कृषि योग्य भूमि में आधुनिक तौर-तरीकों से सुधार लाने में उचित सरकारी सहायता मुहैया कराई जाए। जिन क्षेत्रों में बिजली, पानी, सड़क, अस्पताल, स्कूल-कॉलेज, बैंकिंग सेवा जैसी मूलभूत सुविधाओं का आभाव है वहां पर ये सुविधाएं अविलम्ब उपलब्ध कराई जाएं। सभी छोटे-बड़े पर्यटक स्थलों की अवसंरचना और मार्गों को हमेशा दुरस्त रखा जाए ताकि ज्यादा से ज्यादा पर्यटकों को आकर्षित किया जा सके। साथ ही साथ सभी विकास योजनाएं पर्वतीय क्षेत्र की भौगोलिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए बनाई और क्रियान्वित की जाएं।

प्रवासी युवा अपनी योग्यता और कुशलता के अनुसार अपने ग्राम पंचायत, ब्लॉक या जिला स्तर के अधिकारियों की सहायता से सरकारी योजनाओं का लाभ उठा सकते हैं और स्वरोज़गार जैसे- पशुपालन, बागवानी, मुर्गी और मत्स्य पालन, मशरूम उत्पादन, पर्यटन हेतु स्टे होम, होटल, टूर-ट्रेवल सेवा, कोई स्टार्टअप इत्यादि से अपनी आजीविका सुनिश्चित कर सकते हैं। उपलब्ध संशाधनों और अपनी निवेश की क्षमता को देखते हुए वे सूक्ष्म, लघु और मझले स्तर के उद्योग-धंधे चला सकते हैं। जितना हो सके आत्मनिर्भर बनने का प्रयास कर सकते हैं।

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साथ ही साथ पर्वतीय क्षेत्रों में अपार वन सम्पदा को देखते हुए युवाओं को वनों में उपलब्ध अनेक प्रकार की जड़ी-बूटियों, फल-फूलों इत्यादि से औषधि, फलों का रस, इत्र एवं अन्य उत्पाद बनाने के लिए सूक्ष्म और लघु उद्योग हेतु प्रोत्साहित किया सकता है। अनावश्यक वृक्षों को हटाकर ऐसे वृक्ष लगाए जा सकते हैं जो यहाँ की भूमि की उर्वरता शक्ति को नष्ट ना करें और जल संरक्षण के लिए उपयुक्त हों।