परम्पराओं के निर्वहन तक सिमटा पौराणिक जाख मेला

(देवेन्द्र चमोली)
गुप्तकाशी के पास जाख मंदिर में हर वर्ष बैसाखी को लगने वाला पौराणिक जाख मेला इस बार कोराना महामारी के कारण केवल परम्पराओं की रस्म अदायगी तक सिमट कर रह गया सिमित लोगों की उपस्थिति में इस धार्मिक आयोजन में सारी रस्में अदा की गयी बस इस बार विगत वर्षों की भांति दूर दूर से आये हजारों श्रद्धालुओं की भीड़ ऐतिहासिक जाख भगवान के दहकते अंगारो में नृत्य के साक्षी नहीं बन सकीे।
रुद्रप्रयाग जिले में प्रसिद्ध जाख देवता मंदिर में हर वर्ष अग्नि के धधकते हुए अंगारो के बीच जाख देवता का पश्वा दहकते हुए अंगारों में नृत्य करता है जिसके दर्शनों को दूर दूर से हजारों की सख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचते है व जाख भगवान का आशीर्वाद लेते है।विगत वर्षों की भांति इस वर्ष भी जाख मेला समिति द्वारा सिमित लोंगो की उपस्थिति में पूजा अर्चना की गयी व जाख महराज का पश्वा ने दहकते अंगारो में नृत्य कर लोगो को आशिर्वाद
दिया । लोकडाउन के चलते इस वर्ष हजारों की भीड़ की जगह मात्र कुछ ही लोग इस आयोजन में मौजूद थे जाख मेला समिति के तत्वावधान में चलने वाला जाख मेला क्षेत्र के कोठेडा, नारायणकोटी व देवशाल समेत क्षेत्र के 14 गांवों की आस्था से जुड़ा है मान्यता हैं कि जाख देवता के अग्निकुंड में नृत्य की यह परंपरा नौ सौ वर्ष पुरानी है।
जाख देवता का मंदिर गुप्तकाशी क्षेत्र के देवशाल गॉव मैं स्थित है जाख देवता यक्ष व कुबेर के रुप में भी माने जाते है!