केदारनाथ विधायक मनोज ग्रामीणों की समस्याओं को निकालेंगे जनजागरण यात्रा

रुद्रप्रयाग, क्षेत्र की जन समस्याओं को लेकर अब केदारनाथ विधायक मनोज रावत सरकार से आरपार की लड़ाई लड़ने के मूड में आ गये, ग्रामीणों की कुछ प्रमुख समस्याओं को लेकर विधायक के नेतृत्व में चन्द्रपुरी से गैरसैंण तक जनजागरण यात्रा निकाली जा रही है जिसका कार्यक्रम निम्न प्रकार से है
गैरसैंण चलो
1/3/2020 समय 10:30 बजे सुबह को चन्द्रपुरी से प्रारंभ 12बजे अगस्त्यमुनि मे नुक्कड़ सभा 12:30 तिलवाड़ा मे जनसंपर्क  1:30रुद्रप्रयाग मे प्रेस कांफ्रेंस व जनसंपर्क
3 बजे गौचर के लिये प्रस्थान जागरण यात्रा के मुख्य विन्दु—

1- चौथी विधानसभा के हर सत्र में जंगली जानवरों जैसे – बंदरो , जंगली सुअरों, भालुओं , साहियों, गुलदारों से हो रहे खेती और मानव को नुकसान पर चर्चा हुई पर आज तक उत्तराखण्ड की सरकार या विधानसभा पहाड़ की इस सबसे बड़ी समस्या का तार्किक समाधान नहीं खोज पायी है। खेती -कास्तकारी करने वाली माताओं- बहिनों और किसानों की मेहनत के फल याने फसल को एक ही दिन या रात में ये जंगली पशु खत्म कर देते हैं। विधानसभा में हर बार चर्चा होती है पर नतीजा कुछ भी नहीं निकलता फिर राज्य में विधायिका और सरकार किस काम की ?
2- माननीय उच्च न्यायालय के एक निर्णय के एक बिंदु में बुग्यालों में टैंट लगाने याने कैंपिग पर प्रतिबंध लगाया गया था , यह मुद्दा एक साल पहले विधानसभा में उठाया गया था । सरकार ने आश्वासन दिया था कि इस मामले में सरकार उच्च न्यायालय के निर्णय के विरुद्ध उच्चतम न्यायालय में अपील
करेगी । आज तक सरकार ने इस विषय में कुछ नहीं किया । उच्च हिमालयी क्षेत्र के हजारों युवा बुग्यालों में कैंम्पिग करते हैं वे रोजगार से वंचित हैं। सरकार चाहती तो देहरादून की मलिन बस्तियों को हटाने के उच्च न्यायालय के आदेश से मुक्ति पाने के लिए जिस तरह से विधानसभा में अध्यादेश लायी , वैसे ही इन हिमालयी युवाओं के हित में विधानसभा में
अध्यादेश / बिल लाती परंतु अध्यादेश लाना तो दूर उच्चतम न्यायालय भी नहीं गयी।
3- सरकार ने उत्तराखण्ड विधानसभा में 6 दिसंबर 2018 को उत्तराखण्ड (उत्तर प्रदेश) जंमीदारी और भूमि व्यवस्था अधिनियम – 1950 की धारा – 143 और धारा – 154 में परिवर्तन कर उत्तराखण्ड के पर्वतीय क्षेत्र की जमीनों को लूटने
की छूट दे दी है । उत्तराखण्ड के पहाड़ी क्षेत्रों की अच्छी जमीनों को बेचने का षडयंत्र उत्तराखण्ड की विधान सभा में यह कार्य भाजपा सरकार ने विधानसभा में संख्या बल के दम पर बेशर्मी से किया । आज कश्मीर से लेकर उत्तर- पूर्व तक उत्तराखण्ड ही एकमात्र पहाड़ी राज्य रह गया है जहां बाहरी
लोग कि कितनी भी जमीन खरीद सकते हैं। यदि राज्य की विधानसभा से राज्य के पर्वतीय क्षेत्रों की जमीन को बेचने का षडयंत्र होता रहेगा तो ये प्रश्न उठाना भी जरुरी है कि ये राज्य आखिर किसके लिए बना था ?
4- सरकार पलायन रोकने की बात करती है । सरकार के कही विभाग कृषि ,उद्यान पर कार्य कर रहे हैं , राज्य का कृषि विभाग इनाम भी ले रहा है लेकिन जमीन पर कोई नतीजे नहीं हैं। विधानसभा में पर्वतीय क्षेत्र की कृषि और उद्यान पर उठाए गये प्रश्नों पर कभी न सार्थक चर्चा हुई न ही सरकार इन प्रश्नों का संजीदगी से हल निकालती है।
5- उच्च न्यायालय के कुछ महिने पूर्व के निर्णय के बाद बंजर और बेनाप भूमि फिर से वन भूमि घोशित हो गयी है। जबकि देष भर में बंजर और बेनाप भूमि पर ग्राम पंचायतों का अधिकार है । सरकार चाहती तो इस विशय में भी विधेयक / अध्यादेश ला सकती थी जैसे सरकार देहरादून की मलिन बस्तियों को बचाने के लिए लायी थी , परंतु सरकार को उत्तराखण्ड के पहाड़ी इलाकों की जमीनों को समुदाय के प्रयोग में लाने की कोई चिंता नहीं है। नतीजा ये है
कि अब पेचीदी प्रक्रिया होने के कारण विकास और निर्माण कार्यों के लिए कृषि भूमि का प्रयोग हो रहा है जिससे पर्वतीय क्षेत्र की कृषि भूमि जो लगभग 5 प्रतिषत ही रह गयी है उसका क्षेत्रफल और भी अधिक सिकुड़ रहा है। पर्वतीय जिलो की इस महत्वपूर्ण समस्या का भी कोई समाधान सरकार या विधानसभा ने नहीं निकाला है।
6- राज्य के पर्वतीय क्षेत्रों और तराई के हजारों किसान सालों सेे वन भूमि में निवास करते हैं या उनके सामुदायिक अधिार वनों पर हैं। देश में वनों पर व्यक्तिगत और सामुदायिक अधिकारों को कानूनी मान्यता देने के लिए मनमोहन सिंह सरकार वनाधिकार कानून – 2006 लायी थी जिसके तहत ग्राम, तहसील और जिला स्तरीय समितियों को बना कर जिला स्तर पर ही वनों पर कब्जेधारियों को भू- अधिकार दिए जाने थे परंतु आज तक उत्तराखण्ड में इस कानून का
प्रयोग नहीं किया गया जबकि मध्य प्रदेश में लगभग 5 लाख किसानों और समुदायों को इस कानून के तहत भू- अधिकार मिल गए हैं ।
7- मुख्यमंत्री स्वयं मान रहे हैं कि राज्य में 24000 पद खाली हैं । बेरोजगार सड़कों पर हैं और सरकार पहले तो रिक्त पदों की विज्ञप्ति नहीं निकाल रही है , अगर कोई परीक्षा करा भी रही है तो फारेस्ट गार्ड की परीक्षा की तरह इन परीक्षाओं में गड़बड़ी हो रही है या मामले न्यायालयों में लंबित हैं। उत्तराखण्ड में 2017 के बाद पी0सी0एस0 की परीक्षा नहीं हो
पायी है। पदों के विज्ञापन से लेकर नौकरी के ज्वाइन करने तक सालों लग जा रहे हैं जिससे एक पूरा उम्र वर्ग नौकरी पाने से वंचित रह रहा है। सरकार ने हर क्षेत्र में रिक्तियों के उपलब्धता के अनुसार सतत रोजगार के लिए कोई निति नहीं बनाई है। मामला शिक्षा विभाग के उदाहरण के साथ विधानसभा में उठाया गया लेकिन कोई ठोस आष्वासन नहीं मिला।
8 – राज्य के पर्वतीय क्षेत्र में चिकित्सा की हालात खराब है। दूरस्थ पी0एच0सी0 तो छोड़िये राज्य के पहाड़ी जिलों के जिला चिकित्सालयों में भी विषेशज्ञ चिकित्सकों के पद खाली पड़े हैं। श्रीनगर मेडिकल कालेज भी बस रेफरल चिकित्सालय बन कर रह गया है।
9 – राज्य के पर्वतीय जिलों के सरकारी विद्यालयों के हालात खराब हैं सरकारी अध्यापक मेहनत कर रहे हैं पर राज्य को जिस तरह का राजनैतिक नेतृत्व शिक्षा के क्षेत्र में मिलना चाहिए था वह नहीं मिला पा रहा है विधानसभा में भी शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण विषय पर जब भी चर्चा होती है तब कभी कोई सार्थक हल नहीं निकलता है।
10- राज्य में पिछली कांग्रेस सरकार ने कही तहसीलों – जैसे चोपता(तल्ला- नागपुर) , कही महाविद्यालयों जैसे चोपता(तल्ला- नागपुर) खोलने संबधी शासनादेश जारी कर दिए थे वर्तमान सरकार उन्हें खोलना तो दूर चोपता(तल्ला-
नागपुर) के पालीटैक्निक को तक नहीं बना पा रही है जबकि इस पर करोड़ों रुपए खर्च हो चुके हैं। सरकार कुछ नया खोलना तो दून उसका ध्यान पर्वतीय क्षेत्र के संस्थानों को बंद करने पर है , फिर कैसे सरकार पलायन रोकेगी ?