काम की आशा, तनख्वा की निराशा …..!

✒️ प्रेम पंचोली
उत्तराखंड राज्य में कोरोना संकट के दौरान मुख्यधारा की कार्यकर्ता आशाओं का संकट और बढ़ने लग गया है। जितना खतरा कोरोना से लोगों को है, उससे अधिक खतरा स्वास्थ्य विभाग की आशा कार्यकर्ताओं को सरकार से हो गया है। आशाएं इसलिए आश्वस्त है कि उनकी नैतिक मदद आंगनबाड़ी कार्यकर्ती कर देती है। अन्यथा व निराश हो चुकी होती।

उल्लेखनीय हो की मामूली सी मानदेय पर काम करने वाली आशा कार्यकर्ती इन दिनों चपरासी से लेकर स्वास्थ्य विभाग के आलाधिकारीयो तक के आदेश का पालन कर रही है। इन दिनों उनके लिए रात और दिन एक जैसे गुजर रहे हैं। इसके बदले उन्हें ना तो कोई एक नियमित मानदेय मिल रहा है और ना ही उनके मेहनताना का कोई भुगतान करने की योजना है। कुलमिलाकर आशा कार्यकर्ती निशुल्क सेवा के लिए बाध्य हो गई है। जबकि उनके साथ के सभी कर्मचारियों को अच्छी खासी तनख्वा मिलती है।

ज्ञात हो कि आशा कार्यकर्ती गांव स्तर पर महिलाओं से संबधित जैसे गर्ववती या जच्चा बच्चा को उचित स्वास्थ्य लाभ दिलवाना उनका कार्य है जिसका उन्हें कार्य के बदले स्वास्थ्य विभाग भुगतान करता है। हालांकि यह सरकार की राष्ट्रीय ग्रामीण/शहरी स्वास्थ्य मिशन कार्यक्रम का हिस्सा है, मगर आशाओ से एएनएम से लेकर पटवारी तक कार्य लेते है। इन आशाओ को गांव की सम्पूर्ण जानकारी लिखित में आशा फेसिलेटर व एएनएम को देनी होती है। यही नही गांव में जो भी अधिकारी आएगा उसकी आवभगत का जिम्मा भी आशाओ का ही रहता है। कई बार आशाओ को इस तरह के कार्यक्रमो से आर्थिक संकट का सामना भी करना पड़ता है। इन्हें जो मेहनताना मिलता है वह प्रति प्रसव के हिसाब से मिलता है।

प्रश्न इस बात का है कि एक गांव में माह या दिन में कितने प्रसव होते होंगे? यह इस बात का आंकलन लगाया जा सकता है कि यदि एक गांव में माह में दो या तीन प्रसव हुए तो एक आशा को 1800 रुपये से लेकर 3000रुपये तक मिलता है अर्थात एक माह का मानदेय या मेहनताना। यदि गांव में 100 परिवारों से कम परिवार निवास करते है तो वहाँ प्रसव की संख्या माह में कई बार शून्य रहती है।

अब कोरोनाकाल में आशाओ का काम बढ़ गया है। इनके समझ मे नही आ रहा है कि गांव में प्रतिदिन कितने लोगों का आवागमन हुआ है जिसकी जानकारी उन्हें प्रतिदिन पटवारी, आशा फेसिलेटर, एएनएम को देना होता है, फलस्वरूप इसके उन्हें प्रतिदिन गांव में उपस्थित रहना होता है। यदि इन आशाओ से यह सब नही होता है तो इन्हें पटवारी, आशा फेसिलेटर व एएनएम की बुरी तरह से फटकार खानी होती है। यही वजह है कि राज्य के पहाड़ी जिलो की कई आशाओ ने कोरोनकाल में उनसे जबरन लिए जा रहे काम का विरोध किया है।

ताज्जुब इस बात का है कि पटवारी व एएनएम को लगभग लाख रुपये की तनख्वा मिलती है, और आशा फेसिलेटर को पांच हजार मासिक मानदेय मिलता है, आशा कार्यकर्ती का मानदेय प्रसव पर निर्भर है वह भी 600 रुपये या 1200 रुपये। अतएव 24 घंटे ड्यटी आशा कार्यकर्ती करे और तनख्वा किसी और को मिले यह मानवाधिकारों का खुलमखुल उलंघन है। जिसे सरकार स्पष्ट रूप से देख भी रही है।