हरियाली तीज विशेष

तीज फेस्टिवल के व्रत को भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को हस्त नक्षत्र के दिन मनाया जाता है. इस दिन स्त्रियाँ (कुवारी और सौभाग्यवती) भगवन गौरी-शंकर जी की पूजा करती हैं.माना जाता है की हरतालिका तीज का त्यौहार है यह उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल और बिहार में मनाया जाने वाला यह त्यौहार करवाचौथ के त्यौहार से भी बहुत कठिन माना जाता है.

 

तीज का आगमन सावन में होने वाली भीगी फुहारों से ही शुरू हो जाता है। जिससे चारों ओर हरियाली भी अपने मधुर गान से इस त्यौहार को मनाने के लिए प्रकृति के गले लग जाती है। इस समय बरसात और प्रकृति के मिलने से पूरे वातावरण में मधुर झनकार सी बजने लगती है। इस त्योहार की मधुर बेला के आगमन के समय नव विवाहिता लड़कियों को उनके ससुराल से पीहर बुला लिया जाता है, अपने पीहर आने के बाद महिलाएं गीत गाती हैं, झूला झूलती हैं और नाचती हैं। सावन की तीज में महिलाएं को मायके से काफी भेंट व उपहार मिलते है। जिसमें वस्त्र और मिष्ठान के साथ हरी चूड़ियां, मेंहदी एवं अनेक प्रकार की वस्तुएं होती हैं।

तीज का पर्व करवाचौथ के पर्व से कठिन इसलिए माना जाता है क्योंकि करवाचौथ में आप चाँद देखने के बाद व्रत को तोड़ दिया जाता है वहीं दूसरी तरफ इस व्रत को पूरे दिन किया जाता है जिसे निर्जला व्रत कहते हैं.

इस व्रत को अगले दिन पूजन के पश्चात ही तोड़ा जा सकता है. हरतालिका व्रत से जुडी बहुत सारी मान्यता है जिसमे से एक मान्यता यह है की| तीज व्रत को करने वाली स्त्रिया माँ पार्वती जी के समान ही सुखपूर्वक पतिरमण करके शिवलोक को जाती हैं.

तीज का व्रत इसलिए रखा जाता है क्योंकि जितनी भी सौभाग्यवती स्त्रियां है वे अपने सुहाग को अखण्ड बनाए रखने अथवा जो अविवाहित युवतियां है वह अपने मन मुताबिक वर पाने के लिए हरितालिका तीज का व्रत रखती हैं.इस व्रत कि विशेषता इसलिए और बड जाती है क्योंकि सर्वप्रथम तीज व्रत को माता पार्वती ने भगवन शिव शंकर के लिए रखा था इसलिए तीज का महत्व और ज्यादा बढ़ जाता हैं.

तीज के दिन गौरी−शंकर भगवन की भी पूजा की जाती है और जितनी भी स्त्रियां है जो इस दिन व्रत रखती है वह सूर्योदय से पूर्व ही उठ जाती हैं और नहा धोकर पूरा श्रृंगार करती हैं. गौरी−शंकर भगवन की भी पूजा करने के लिए केले के पत्तों से मंडप बनाकर इनकी प्रतिमा स्थापित की जाती है| इसके अतिरिक्त माँ पार्वती जी को सुहाग का सारा सामान चढ़ाया जाता है. इस दिन रात को तीज के गीत (भजन) और कीर्तन का आनंद लिया जाता है और जागरण कर तीन बार आरती की जाती है और भगवान् शिव पार्वती विवाह की कथा भी सुनी जाती है.

इस व्रत को पात्र कुवारी कन्यायें या सुहागिन महिलाएं दोनों ही रख सकते हैं परन्तु एक बार अगर आपने व्रत रख लिया तो जीवन पर्यन्त इस व्रत को रखना पड़ता हैं. अगर किसी प्रकार कोई महिला गंभीर रोगी की हालात या बिमार है तो उसके बदले दूसरी महिला या फिर उसका पति भी इस व्रत को रख सकता हैं.
इस दिन प्रातः काल स्नान करने के पश्चात् श्रद्धा एवम भक्ति पूर्वक किसी सुपात्र सुहागिन महिला को खाद्य सामग्री, वस्त्र, श्रृंगार सामग्री, फल, मिष्ठान्न एवम यथा शक्ति आभूषण का दान करना चाहिए.

तीज के दिन महिलायें पारम्परिक डिज़ाइन के वस्त्र पहनती है, अपना सिंघार करती है अथवा अपने हाथों और पैरों में मेहंदी लगाकर तीज फेस्टिवल का आनन्द लेती हैं. कई महिला के लिए अपने माता-पिता के घर भी जाती है और रक्षा बंधन तक वही रहती हैं और अपने प्रिय भाई के लिए प्रार्थना करती हैं.

जहाँ महिलाएँ अपने भाइयों की लम्बी आयू और घन सम्पति के लिए प्रार्थना करती हैं वही दूसरी और विवाहित महिला / दुल्हन को उसके ससुराल वाले कुछ उपहार देते हैं. ऐसा करना बहुत शुभ माना जाता है.उत्तरी भारत के आसपास देखा जाने वाला तीज जुलूस देखने योग्य होता है क्योंकि यह तीज माता के सम्मान के लिए भव्य व्यवस्था के रूप में दर्शाया जाता है. देवी पार्वती या तीज माता की प्रतिमा को सोने के गहरे और सुंदर रेशम से सजाया जाता हैं. इसमें कई प्रकार के संगीत, नृत्य का प्रदंशन होता है जिसे पूरे शहर में चरों और घुमाया जाता है.

कुछ फोक गीत जो हरियाणा में ज्यादा प्रचलित हैं-

आया तीजां का त्योहार
आज मेरा बीरा आवैगा

सामण में बादल छाए
सखियां नै झूले पाए
मैं कर लूं मौज बहार
आज मेरा बीरा आवैगा

नांनी नांनी बूंदियां मीयां बरसता हे जी
हां जी काहे चारूं दिसां पड़ेगी फुवार
हां जी काहे सामण आया सुगड़ सुहावणा
संग की सहेली मां मेरी झूलती जी
हमने झूलण का हे मां मेरी चाव जी
हां जी काहे सामण आया सुगड़ सुहावणा
सखी सहेली मां मेरी भाजगी जी
हां जी काहे हम तै तो भाज्या ना जाय
पग की है पायल उलझी दूब में जी
नांनी नांनी बूंदियां मीयां बरसता जी
हां जी काहे चारूं पास्यां पड़ेगी फुवार

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