पौडी गढ़वाल का “गुजडू जैविक” – लॉक डाउन के बाद उत्तराखंड वापस आये युवाओं के लिए स्वरोजगार का उत्कृष्ट मॉडल

 

पौडी गढ़वाल का “गुजडू जैविक” – लॉक डाउन के बाद उत्तराखंड वापस आये युवाओं के लिए स्वरोजगार का उत्कृष्ट मॉडल। कैसे दो भाइयों ने बंजर पड़ी जमीन को दुनिया के सबसे उन्नत बीजों के साथ, आधुनिक तकनीक के सहारे लहलहाती जैविक खेती में बदल दिया।

वैश्विक महामारी कोरोना के प्रकोप से लाखों युवा देश विदेश से अपने घर आ रहे हैं, शहरों में रोजगार का संकट खड़ा हो गया है। देश में बेरोजगारों की संख्या में बेतहासा वृद्धि हुई है। उत्तराखंड का युवा आजीविका के लिए अब अपने प्रदेश में कुछ करना चाहता है उसके पास अभी शहरों में जाने का विकल्प नहीं है। ऐसे में युवाओं के लिए क्या अवसर है ? इन युवाओं के लिए एक बेहतरीन मॉडल है गुजडू जैविक

वास्तव में रिवर्स पलायन के लिए कुछ युवा चुपचाप अपना काम कर रहे हैं, वो तब समाज के सामने आते हैं जब एक सफल मॉडल प्रस्तुत करते हैं। इस सफलता में निरंतरता, धैर्य और मेहनत की अत्यंत आवश्यक होती है। गुजडू जैविक भी एक ऐसा ही सफल प्रयास है जिसे अन्य जगह भी क्रियान्वित किया जा सकता है। पौड़ी गढ़वाल के धुमाकोट, गुजडू पट्टी में बंजर खेतों मे आधुनिक तकनीक से आर्गेनिक खेती का सपना देखा धुमाकोट के मूलनिवासी अनिल शर्मा ने। बंजर पड़ी अपनी जमीन को दुबारा आबाद करने के लिए अनिल से अपने छोटे भाई अरुण के साथ इसकी शुरुआत की। शुरुआत में कुछ कठनाइयों के बाद मेहनत रंग लायी। आज उनके खेतों की सब्जियाँ हाथों हाथ बिक रही हैं. अनिल शर्मा बताते हैं कि शुरुआत मे उनके सामने कई समस्याएं आयी जिसमे सबसे पहले पानी है। किसी भी खेती को करने से पहले वहां पानी पहुंचना आवश्यक है इसके लिए एक जल स्रोत से पानी की ब्यवस्था की गयी। फिर हल, बिजली, अन्य संसाधन पहुंचाया गया, सिर्फ हल लगाने मे ही हज़ारों रूपये खर्चा हो गया, फिर आधुनिक मशीनों से खुदाई और हल लगाया गया. खेतों को ठीक किया गया, चारों ओर तार बाढ़ लगायी गयी। पहले वर्ष सिर्फ मक्का की खेती की गयी. अगले वर्ष अनिल ने दुनिया के उन्नत किस्म के बीजों की पहचान कराई जिसमे से कुछ इंडो अमेरिकन जैसे बीजों की डीलरशिप स्वयं अनिल शर्मा के पास है. शिमला मिर्च, प्याज़, टमाटर, केसर की खेती लहलहारही है. अगले वर्ष शिमला मिर्च, प्याज़, टमाटर, केसर की खेती लहलहा रही थी. इस वर्ष भी बेहतर उत्पादन के साथ खेत लहलहा रहे हैं। ब्लॉक स्तरीय टीम अब यहाँ सीखने के लिए आती रहती है कई स्वयं सहायता समूहों का भी यहाँ जानने सीखने के लिए आना होता है।

पहाड़ों में खेती करने में दूसरी बड़ी समस्या पशुओं की है, गाय बकरी के लिए तार बाढ़ उपयोगी है पर सीढ़ीनुमा खेतों में बन्दर कही से भी चढ़ जाते हैं इसके लिए पारम्परिक तरीके का ही उपयोग किया गया, बन्दर रात में नहीं आते सुवरों से रुरक्षा के लिए मोटी दीवार देनी ही होती है, इसे आप मनरेगा, वन विभाग के माध्यम से भी करवा सकते हैं।

अनिल शर्मा के अनुसार सरकार द्वारा भी कृषि उपकरणों के लिए सब्सिडी दी जाती है। कृषि उपकरणों के लिए सरकार ८०% सब्सिडी देती है, मतलब अगर आप दस लाख के कृषि उपकरण सरकार से लेते हैं तो आपको सिर्फ दो लाख ही खर्चा करना होता है। यह प्रोसेस थोड़ा जटिल है पर कागजी कार्यवाही जरूरी हो जाती है। फिर एक बार आप सफल हो गए तो कई विभाग आपके पास खुद पहुंच जाते हैं “अनिल शर्मा का कहना है कि उनका उद्देश्य युवाओं को एक मॉडल प्रस्तुत करना है जिसमे वह कम इन्वेस्टमेंट से अपने घर मे अपने लिए आजीविका जुटा सकता है” पहाड़ों मे जिन खेतों मे हमारे पूर्वजों का पसीना बहा हो वह बंजर ना रहे. इस रोजगार में अपार संभावनाएं हैं, दुनिया वापस आयुर्वेद और जैविक खेती की और आ रही है। अभी गुजडू आर्गेनिक द्वारा उगाई सब्जियां स्थानीय बाजारों में ही हाथों हाथ बिक जाती हैं। अगर आपको अपने गांव का स्वाद कही शहर में मिल जाये तो आप क्यों नहीं लेना चाहोगे, गुजरू आर्गेनिक द्वारा इसके लिए आगे पहल की जाएगी, उत्तराखंड में इसकी अपार संभावनाएं हैं जिसको सही दिशा देने की आवश्यकता है।

अनिल अब उत्तराखंड की हस्त शिल्प को भी प्रोत्साहित करना चाहते हैं जिसमे रिंगाल से बने उत्पादों को बनवाएंगे इससे शिल्पकारों को रोजगार के अवसर भी मिलेंगे और पहाड़ी उत्पादों को नयी पहचान। गुजडू आर्गेनिक पर दूरदर्शन के कृषि विभाग सहित कई डॉक्यूमेंट्री बन रही है, यह एक जैविक खेती का पहाड़ों में आदर्श मॉडल है। सरल जीवन शैली और आकर्षक व्यक्तित्व के धनी अनिल शर्मा कैंप कंपनी के सभी परियोजनाओं के महानिदेशक भी हैं। यह कंपनी उत्तराखंड में १०८ आपातकालीन सेवा का सञ्चालन भी करती है।