गढ़वाली कविताएं : ब्‍यो का बाद ” कुजाणि क्‍य क्‍य करदु छो”

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साहित्य सृजन
 ब्यो का बाद
चन्ट छौ, चालाक छौ,
बच्यान्दु बि बिण्डि छौ,
हैसान्दु छौ,
रूवान्दु छौ,
 कुजाणि क्य-क्य करदु छौ।
होन्दु छौ खान्दु छौ,
पढ्युं छौ लिख्युं छौ,
नौकरिदारबि ह्वेगे छौ,
कमान्दुबि खूब छौ।
हुण्त्याळि देखिक वेकि,
ब्योकु तैं नौनि खुजै,
ब्योकु दिन जुड़ै,
ब्वारि घौर लै,
गृहस्त कु जंजांळ अब शुरू ह्वेगि छौ।
ब्यो का बाद देखि मिन वेकि,
लबड़्यांन्दि धौण, अर टोटगि मौण,
खुरसि कपालि, अर सिल्लि गिच्चि,
किलैकि अब वेकु ब्यो ह्ेवगि छौ।

मौल़्यार

खरड़ा डाण्डो अर ,
झड़दा डाळों पर,
मौल़्यार ऐगे।
झुकदा फांगों अर,
बुति लगल्यंु मा,
फुल़्यार ऐगे।
हिटदा बाटों अर,
सुखदा छ्वायों पर ,
सबराट ह्वेगे।
होन्दा बाळांे अर,
जान्दा दानों पर,
कबलाट ह्वेगे।
उकटदा मनख्युं अर,
बिकच्यां छोरों पर ,
हुलस्याट छैगे।
रामदि गौड़ि भैसिं अर,
बल्दु का गुठ्यार,
भिबराट ह्वेगे।
सैंकि जूिड़ दाथुड़ि अर
नाड़ि निसूड़्यू पर ,
धिओडु लगिगे।
खरड़ा डाण्डो अर ,
झड़दा डाळों पर,
मौल़्यार ऐगे।
रचियता * सुरेश स्नेही
गढ़वाली काव्‍य के रचियता, टिहरी गढ़वाल के सुरेश स्नेही उत्तराखण्ड पुलिस में सेवारत हैं, पहाड़ की ज्‍वलन्‍त समस्याओं और समसामयिक विषयों पर अपनी भाषा में सार्थक कविताओं का लेखन करते है। गढ़वाली भाषा में उनकी कई कविताएं पत्र पत्रिकाओं  में प्रकाशित हो चुकी हैं ।