‘करार’ में मान जाने वाला ‘फकीरवा’ और जान लेने वाला ‘दैत्य’

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(चारू तिवारी)
कड़कड़ाती ठंड। घुप्प रात का अंधेरा। दूर कई गांवों तक उजाले का नाम नहीं। काली अंधेरी रातें। आकाश में चांद-तारे जहां हमें उजाला देते और जमीन पर पहाड़ की चोटियों में जलते ‘ट्वाल’ हमें डराते रहते। ‘भूत’ की कई कहानियां जुड़ी थी ‘ट्वाल’ से। कितने ‘ट्वाल’ एक साथ खड़े हो जाते थे। कई बार लगता था कोई मशाल जुलूस निकाला जा रहा हों। बाद में हमें बताया गया कि यह भूतों की बारात है। हम भी मान लेते थे।
कितने सारे भूतों के गधेरे थे। हर गधेरे में भूत। कई ‘उड्यारों’ के नाम भूतों पर थे। ‘पदु बुड्यो का उड्यार’। कई पेड़ों में भूत रहते थे। माल बाखई की खिमुली ने इसी पेड़ में ‘फांस’ लगा दी थी बल। कई ‘रौ’ भूतों के थे। कई नई ‘ब्वारियां’ रौ पड़ी ठहरी। ‘बचुली का रौ’, ‘धनुली का रौ’। वहीं पार के तप्पड़ में पाथर निकालते वक्त पाथर की खाण में फकीरवा दब गया करके बताने वाले हुये। तब से रात को यहीं दिखाई देने वाला हुआ।
एक बीड़ी में ही मान जाने वाला हुआ। घर के पास तक छोड़ आने वाला हुआ। जो भी भूत की कहानी सुनाता लगभग एक जैसी होने वाली हुई सब भूतों की कहानी। लंबे कद का आदमी। झग सफेद कुर्ता, चूड़ीदार पजामा पहने। सिर पर ‘टांक’ (पगड़ी)। हाथ में अपने से लंबा ‘लट्ठ’। कई बार तो गांव के ‘बयानवीरों’ के मुंह से उनके साथ होने वाली लड़ाई के बहुत ‘पराक्रमी’ किस्से भी सुनने को मिलते। हर गांव में एक आदमी जरूर मिलेगा जो बतायेगा कि फलां गधेरे में उसकी भूत से कैसे ‘गुर्दा-फानी’ हुई। उसने जब भूत को पटखनी दी तो उसने कहा मेरे से बड़ा ताकतवर कहां से आ गया! तब से उसने बचन दिया कि आज से तेरे गांव वालों पर नहीं लगेगा। वो तो बाद में पता चलने वाला हुआ कि यह भूत है करके जब उसके ‘उल्टे पांव’ दिखाई देने वाले हुये। नहीं तो वह हमारे ही बीच का जैसा लगने वाला ठहरा। भूत से ‘गुर्दा-फानी’ करने वाला भी जब चित बीमार पड़ जाने वाला हुआ तब ‘पुछ्यार’ बताने वाला हुआ कि उसे फलां गधेरे का भूत लग गया करके। श्मशान तो भूतों की बड़ी संसद थी। कभी लगता था कि दिन में आदमी और रातों में भूतों की सत्ता कायम रहती है।
इतना सबकुछ होने के बाद भी ये भूत हमारे बीच के ही हुये। हम इन सबको जानने वाले हुये। कब आयेगा उसका पता भी हुआ। उसके रूप-रंग को भी पहचानने वाले हुये। उसका व्यवहार भी पता होने वाला हुआ। वह बीड़ी मांगने वाला है, ‘अत्तर’ खाने वाला है या ‘रोट-भेट’ में मान जाने वाला हुआ यह भी पता हुआ। लोग बताने वाले हुये कि वो फकीरवा जब पाथर की खान में दब गया तो उसकी एक ही इच्छा रह गई बीड़ी पीने की। एक ‘शेर बीड़ी’ का बंडल उसके लिये रख देना हुआ। खिमुली बेचारी ने कैसे फांस खाई ठहरी। सुहाग भी अच्छी तरह नहीं देखा ठहरा। इसलिये उसके लिये ‘कांन दाबड़ी’ चैबाटे पर कुछ ‘चूड़ी-चरेऊ’ रख देने हुये। जब बचुली ‘रौ’ पड़ी तो कितनी भुगती थी उसने। वह भी कुछ ‘छौ-छित्तर’ में ही मान जाने वाली हुई। एक तरह से इन सबसे भी हमारा गहरा नाता हुआ। गांव के चारों ओर अदृश्य चैकीदारी इन्हीं के जिम्मे ठहरी। जब ये थे तब भी और जब नहीं हैं, तो युग-युगान्तर हमारे बीच में बने रहे हैं। उनकी भी अपनी थाती हुई। अपनी जमीन से जुड़ाव हुआ। जब वह किसी पर लगने वाले हुये तो ‘चैलीक च्यल, गौव बाछ’ तक कहीं तक नहीं छोड़ने वाले हुये। गुस्सा भी करेंगे तो ‘बाट’ भी बता जाने वाले हुये। एक तरह से जन्म-जन्मातर का रिश्ता। झकझोरने वाला, याद दिलाने वाला। अच्छे-बुरे की। बाद में ‘परचे’ लगने लगे तो हमारे देवता भी बन गये। लोक के देवता गांव के रक्षक। हमने उन्हें ‘थाप’ भी दिया, अलग-अलग ‘थानों’ में। अपने ही जैसे नाम भी दे दिये। अब वे हमारे ‘पितर’ हो गये। हम भी निर्भय हो गये।
अब सारे गधेरों, नदियों, जंगलों, जमीन में ‘सरकारी’ भूत हैं। हमारी बिरादरी से अलग। सारी नदियों में भूत के अड्डे हैं। अब कोई तकलीफ से नदी में ‘रौ’ पड़ने वाला नहीं है। जंगल में फांस खाने वाला नहीं है। अब ये नये अवतार में हैं। पुराने भूतों की जगह नये भूत आने लगे हैं। बहुत खतरनाक। दैत्याकार। कारपोरेट के भूत, सरकारी योजनाओं के भूत, विकास के भूत। हमारे भूत तो बहुत छोटे थे। हमारे ही कद के थे। हम जानते थे उन्हें नाम से, खानदान से। हमारी ही बिरादरी के हुये। हमारी ही रिश्तेदारी के हुये। जिस ‘भांैर’ (घूमते पानी) में गोपुली ‘रौ’ पड़ी ठहरी उसमें अब सरकारी ठेका हो गया है। चुगान का। खनन का। अब गोपुली नहीं आती। नहीं सुनाई देती है उसकी करुण रोने की आवाज। कभी दूर गांव वालों को भी सुनाई देती थी। अब गोपुली भी नहीं आती। डर जाती होगी क्रेशर की आवाज से। इस ‘रौ’ की तरफ आने वाले आगे के गधेरे में जिस गांव वाले की भूत से ‘गुर्दा-फानी’ हुई थी वह बयानवीर अब उस पाथर की खान में दब गये फकीरवा का जिक्र नहीं कर रहा है। अब वह उसे बीड़ी भी नहीं पिला रहा है। उसके सामने वह सल्ट का, द्वाराहाट का, चंपावत का, रामनगर से आया बड़ा भूत खड़ा है, हल्द्वानी के गोला के भूतों को साधने वाला दूसरी पार्टी का युवा नेता है। वह ‘लोकतांत्रिक’ तरीके से चुना हुआ है। उसके थान भी अब ग्लोबल हैं। उसका थान अब तुम्हारे बेतालघाट, रामगंगा, गगास, कोसी, नयार, गोला, मलेथा में ही नहीं हैं, अब वह बहुत बड़े मंदिरों में रहता है। दिल्ली और देहरादून में उसके बड़े मठ हैं। उसने अपने सारे गण छोड़े हैं। उसकी पार्टी गांव-गांव तक है। लोकसभा, विधानसभाओं, ग्राम पंचायतों तक उसने अपने ‘पैने नाखून’ लिये बड़ी जमात छोड़ी है। बिल्कुल ‘संवैधानिक’ तरीके से। फकीरवा से बड़ी मूंछे हैं उसकी। फकीरवा से बड़ा ‘झग सफेद’ चोला है उसका।
फकीरवा तो पैदल ही आता था बड़ा सा लट्ठ लिये, गांव तक। अब यह बड़ी गाड़ी में आता है। लट्ठ की जगह लाइसेंसी बंदूक है उसके पास। यह तो गांव के बाहर ही दबोच लेता है। बीड़ी की जगह पूरी जमीन को निगलने के उतारू है। यह भूत कुछ मांगता नहीं छीन लेता है। ‘गुर्दा-फानी’ करने का मौका ही नहीं देता।
अब गोपुली की असहाय पीड़ा की जगह उसके क्रेशर की कर्कश आवाज है जो डरा रही है पूरी घाटी को। यह ‘पदु बुड़’ जैसा उदार नहीं है, जो अपने उड्यार में बरसात या धूप से बचने के लिये पनाह दे। यह गोपुली जैसा संवेदनशील नहीं है, जो अपने सुहाग के प्रतीक को लेकर खुश हो जाये। फकीरवा जैसा जनपक्षीय नहीं है, जो तुम्हें सुरक्षित घर तक छोड़ जायेगा। बचुली जैसा सहृदय नहीं है जिसके ‘रौ’ में हम बिना किसी भय के गोता लगा सकते हैं। खिुमली जैसा सरल नहीं है जिसकी पेड़ की छांव में हम बिना किसी परेशानी का अपना पड़ाव लगा सकते हैं। हमारा भूत तो ‘करार’ में मान जाता था, यह तो जान ही लेकर मानेगा। आइये जिस तरह अपने भूत को हमने पूजा कर मनाया, इस दैत्य को ‘लड़कर’ हरायेंगे।
(लेखक उत्तराखण्ड के वरिष्ठ पत्रकार हैं
तथा समसामयिक विषयों पर सकारात्मक लेखन करते हैं । )