सफरनामा : बालासाहेब केशव ठाकरे

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महाराष्ट्र के प्रसिद्ध एवं कददार राजनेता बालासाहब ठाकरे, जिन्होने शिव सेना के नाम से एक प्रखर हिन्दूराष्ट्रवादी दल का गठन किया था। उन्हें लोग प्यार से बालासाहेब भी कहते थे। बालासाहब मराठी में सामना नामक अखबार निकालते थे। इस अखबार में उन्होंने अपनी मृत्यु से कुछ दिन पूर्व अपने सम्पादकीय में लिखा था-“आजकल मेरी हालत चिन्ताजनक है किन्तु मेरे देश की हालत मुझसे अधिक चिन्ताजनक है; ऐसे में भला मैं चुप कैसे बैठ सकता हूँ? कुछ लोग उन्हें हिन्दू हृदय सम्राट भी कहते थे और आज भी उनका उतना ही सम्मन करते हैं |

बालसाहा ठाकरे ने जीवन का सफर एक कार्टूनिस्ट के रूप में शुरू किया था। पहले वे अंग्रेजी अखबारों के लिये कार्टून बनाते थे। उन्होंने महाराष्ट्र में मराठी भाषी लोगों को संगठित करने के लिये संयुक्त मराठी चालवाल (आन्दोलन) में प्रमुख भूमिका निभायी और बम्बई को महाराष्ट्र की राजधानी बनाने में 1950 के दशक में काफी काम किया। बाद में उन्होंने सन 1960 में मार्मिक के नाम से अपना एक स्वतन्त्र साप्ताहिक अखबार निकाला और अपने पिता केशव सीताराम ठाकरे के राजनीतिक दर्शन को महाराष्ट्र में प्रचारित व प्रसारित किया। सन् १९६६ में उन्होंने शिवजी महाराज से प्रेरित हो शिव सेना की स्थापना की।

स्पस्ट लिखने का और बोलने का उनका ये अंदाज़ जनता को इतना भाया करता था जिस कारण,उन्होंने मराठी भाषा में सामना के अतिरिक्त उन्होंने हिन्दी भाषा में दोपहर का सामना नामक अखबार भी निकाला। खरी बात कहने के कारण वे मृत्यु पर्यन्त वो सुर्खियों में बने रहे

जातिवाद के घूर विरोधी बालासाहेब का जन्म 23 जनवरी 1926 को पुणे में केशव सीताराम ठाकरे के यहाँ हुआ था। उनके पिता केशव चान्द्रसेनीय कायस्थ प्रभू परिवार से थे। वे एक प्रगतिशील सामाजिक कार्यकर्ता व लेखक थे

बालासाहेब का विवाह मीना ठाकरे से हुआ। उनसे उनके तीन बेटे हुए-बिन्दुमाधव, जयदेव और उद्धव ठाकरे।

खुद को अडोल्फ हिटलर का प्रशंसक बताने वाले बाल ठाकरे ने महाराष्ट्र में मराठियों की एक ऐसी सेना बनाई, जिनका इस्तेमाल वह विभिन्न कपड़ा मिलों और अन्य औद्योगिक इकाइयों में मराठियों को नौकरियां आदि दिलाने में किया करते थे। उनके इन्हीं प्रयासों ने उन्हें ‘हिंदू हृदय सम्राट’ बना दिया।

हालांकि राजनीतिज्ञ के रूप में शुरुआती दौर में बाल ठाकरे को अपेक्षित सफलता नहीं मिली लेकिन अंततः उन्होंने शिव सेना को सत्ता की सीढ़ियों पर पहुँचा ही दिया। 1995 में भाजपा-शिवसेना के गठबन्धन ने महाराष्ट्र में अपनी सरकार बनाई। बाल ठाकरे अपने स्पष्ट बयानों के लिये जाने जाते थे और इसके कारण उनके खिलाफ सैकड़ों की संख्या में मुकदमे दर्ज किये गये थे।

बाला साहेब को उनके निरन्तर खराब हो रहे स्वास्थ्य के चलते साँस लेने में कठिनाई के कारण 25 जुलाई 2012 को मुम्बई के लीलावती अस्पताल में भर्ती किया गया। 14 नवम्बर 2012 को जारी बुलेटिन के अनुसार जब उन्होंने खाना पीना भी त्याग दिया तो उन्हें अस्पताल से छुट्टी दिलाकर उनके निवास पर ले आया गया और घर पर ही सारी चिकित्सकीय सुविधायें जुटाकर केवल आक्सीजन के सहारे जिन्दा रखने का प्रयास किया गया। उनके चिन्ताजनक स्वास्थ्य की खबर मिलते ही उनके समर्थकों व प्रियजनों ने उनके मातुश्री आवास पर, जहाँ अन्तिम समय में उन्हें चिकित्सकों की देखरेख में रखा गया था, पहुँचना प्रारम्भ कर दिया उनको देखने वालो का हजूम देख कर उनकी लोकप्रियता का अंदाज़ा लगाया जा सकता था |

तमाम प्रयासों, दवाओं व दुआओं के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका और 17 नवम्बर 2012 को मुम्बई में अपने मातोश्री आवास पर दोपहर बाद 3 बजकर 33 मिनट पर उन्होंने अन्तिम साँस ली।

उनकी शव यात्रा में एक रिपोर्ट के मुताबिक २० लाख लोग शामिल हुए जिनमें नेता, अभिनेता, व्यवसायी वर्ग के अलावा हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख व ईसाई – सभी समुदायों के लोग थे। शिवाजी मैदान पर पूरे राजकीय सम्मान के साथ उनकी अंत्येष्टि की गयी। इस अवसर पर लालकृष्ण आडवानी, सुषमा स्वराज, अरुण जेटली, नितिन गडकरी, मेनका गांधी, प्रफुल्ल पटेल और शरद पवार के अतिरिक्त अमिताभ बच्चन, अनिल अंबानी भी मौजूद थे।

मराठी मानुस’ की नब्ज को बहुत अच्छी तरह समझने का हुनर रखने वाले बाल ठाकरे इस कहावत के पक्के समर्थक थे कि ज्यादा करीबी से असम्मान पनपता है और इसीलिए उन्होंने सदा खुद को सर्वश्रेष्ठ बताया। समर्थकों से घुलना-मिलना पसंद नहीं था अपने समर्थकों से ज्यादा घुलना-मिलना और उनके करीबी उन्हें पसंद नहीं थी और वे अपने बेहद सुरक्षा वाले आवास ‘मातोश्री’ की बालकनी से अपने समर्थकों को ‘दर्शन’ दिया करते थे। प्रसिद्ध दशहरा रैलियों में उनके जोशीले भाषण सुनने लाखों की भीड़ उमड़ती थी।

हालांकि ठाकरे ने खुद कभी कोई चुनाव नहीं लड़ा, लेकिन शिवसेना को एक पूर्ण राजनीतिक दल बनाने के बीज बोए जब उनके शिव सैनिकों ने बॉलीवुड सहित विभिन्न उद्योगों में मजदूर संगठनों पर नियंत्रण करना शुरू किया।

1980 के दशक में मराठी समर्थक मंत्र के सहारे बृहन्मुंबई नगर निगम पर कब्जा कर लिया। भाजपा के साथ 1995 में गठबंधन करना ठाकरे के राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा मौका था और इसी के दम पर उन्होंने पहली बार सत्ता का स्वाद चखा। वे खुद कहते थे कि वे ‘रिमोट कंट्रोल’ से सरकार चलाते हैं। हालांकि उन्होंने मुख्यमंत्री का पद कभी नहीं संभाला।

बालासाहब की जीवन पर आधारित कई फिल्मो तक का निर्माण हुआ जिसमे उनके जीवन और संघर्ष पर आधारित व्यक्तित्व को दिखाया गया महाराष्ट्र की राजनीती को दर्शाती इन फिल्मो में मशहूर कलाकारों तक ने अपने अभिनय से उनके जीवन को दर्शाने कोशिश की |

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