पीरियड्स में महिलाओं का दिमाग तेज हो जाता है, बेहद चौंकाने वाली है ये रिसर्च?

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औरतों में माहवारी एक बुनियादी अमल है। यही क़ुदरती अमल उसे समाज में औरत का दर्जा दिलाता है। कहना गलत नहीं होगा कि इंसानी कायनात का दारोमदार इसी पर टिका है। माहवारी से पहले और उसके दौरान महिला की अपने शरीर और खुद से लड़ाई चलती रहती है। उसके मिजाज में बहुत से बदलाव नजर आने लगते हैं। प्राचीन काल में इसे औरत को पड़ने वाले दौरे के तौर पर देखा जाता था।

ये सही बात है कि माहवारी शुरू होने से पहले औरत के मूड में बदवाल आता है। उसका मिजाज चिड़चिड़ा हो जाता है। शरीर के किसी ना किसी हिस्से में अजीब खिंचाव या दर्द होने लगता है। ये इशारा करती है कि अब बस कुछ ही वक्त में ब्लीडिंग शुरू होने वाली है, लेकिन ऐसा सभी औरतों की हो ये जरूरी नहीं है। कुछ महिलाओं को दर्द बहुत ज्यादा होता है, कुछ को कम। जबकि कुछ को नाकाबिल-ए-बर्दाश्त दर्द होता है। आज भी बहुत से लोग मानते हैं कि औरत की ये सेक्स से महरूमी के सबब होती है।

माहवारी चक्र पर 1930 के दशक से रिसर्च की जा रही है। वैज्ञानिकों के लिए भी ये रिसर्च का दिलचस्प विषय है। इसकी प्रेरणा उन्हें सिर्फ महिलाओं की बायोलॉजी समझने से नहीं मिली है। बल्कि इस बात से मिली की औरतें, मर्दों से किन मायनों में और कितना अलग हैं। इन दोनों के बीच फर्क की बुनियादी मिसाल हमारे दिमाग में है।

यहां तक कि मिस्र से लेकर ग्रीस के दार्शनिकों का मानना था कि हर महीने औरत के मन में सेक्सुअल डिजायर का उफान उठता है। जब ये डिजायर पूरी नहीं होती तो उसके शरीर से खून का रिसाव शुरू हो जाता है।

यही वजह है कि आज भी कम पढ़े-लिखे लोग लड़कियों को समझाते हैं कि शादी के बाद दर्द की ये शिकायत दूर हो जाएगी, लेकिन मॉडर्न साइंस और रिसर्च माहवारी के दौरान महिलाओं में होने वाले इस बदलाव के कई पॉजिटिव पहलू देखती है।

नई रिसर्च के मुताबिक, माहवारी पूरी होने के बाद औरतों में खास तरह की जागरूकता बढ़ जाती है। माहवारी के तीन हफ्ते बाद उनके कम्युनिकेशन स्किल बेहतर हो जाते हैं। जिन बातों को दूसरे लोग कहने में डरते हैं, उन्हें वो खुलकर कह देती हैं। जैसे ही माहवारी का नया चक्र शुरू होता है, उनका जहन तेजी से काम करना शुरू कर देता है।

पुराने दौर में लोग मानते थे कि औरत के मिजाज में ये बदलाव पेट में चल रही उथल-पुथल की वजह से होते हैं। जबकि इन बदलावों का सोर्स अंडाशय है, जहां ओएस्ट्रोजन और प्रोजेस्ट्रोन नाम के दो हार्मोन पूरे महीने अलग-अलग मात्रा में निकलते रहते हैं और पेट की दीवार के चारों तरफ एक चादर बनाते हैं। यही हार्मोन फैसला करते हैं कि अंडा कब तैयार करना है। इसी हार्मोन की वजह से औरत की सेहत और मिजाज दोनों पर असर पड़ता है।

ब्रिटेन की डरहम यूनिवर्सिटी के न्यूरोसाइंटिस्ट मार्कस हसमैन के मुताबिक, वर्षों तक यही माना जाता रहा कि मर्द और औरत दोनों अपने हार्मोन की वजह से हर महीने इस तरह के चक्र से गुजरते हैं। औरतों में माहवारी होती है और मर्दों में टेस्टोस्टोरोन का स्तर बढ़ता घटता है। जबकि औरतों का दिमाग मर्दों से अलग काम करता है। उनके दिमाग की थ्योरी मर्दों से बेहतर होती है। यही वजह है कि उनके कम्युनिकेशन और सोशल स्किल मर्दों से बेहतर होते हैं।
मर्दों के मुकाबले नए शब्द तेज़ी से याद करती हैं महिलाएं

शिकागो यूनिवर्सिटी की मनोवैज्ञानिक पाउलिन मकी का कहना है कि औरतों का जहन किसी भी शब्द की हिज्जे मर्दों के मुकाबले तेजी से याद रखता है। यही नहीं औरतें मर्दों के मुकाबले तेजी से बोलती हैं और उनके जहन में दर्ज लफ्जों की तादाद, मर्दों से ज्यादा होती है।

माना जाता है कि हजारों वर्ष पहले औरतें अपने बच्चों को अच्छे-बुरे के बीच फर्क करने के उपदेश देती रही हैं, शायद इसलिए भी लड़कियों को बोलने की प्रैक्टिस अच्छी होती है, लेकिन क्या इस वजह के पीछे भी हार्मोन जिम्मेदार हैं, ये बड़ा सवाल है।

इसी सवाल का जवाब तलाशने के लिए मनोवैज्ञानिक पाउलिन मकी ने बाल्टीमोर के जेरोन्टॉलजी रिसर्च सेंटर के कुछ रिसर्चर के साथ मिलकर एक तजुर्बा किया। उन्होंने ये पता लगाने की कोशिश की कि औरतों में ओएस्ट्रोजन का बढ़ता-घटता स्तर हर महीने उन पर कैसा और कितना असर डालता है। इसके लिए उन्होंने दो स्तर पर तजुर्बा शुरू किया। हालांकि इस तजुर्बे का सैंपल साइज छोटा था। केवल 16 महिलाएं ही प्रतिभागी थीं। इन सभी का पीरियड शुरू होने से पहले और पीरियड खत्म होने के बाद का बर्ताव देखा गया।

रिसर्च के नतीजे हैरान करने वाले थे। सभी प्रतिभागी महिलाओं में जिस वक्त फीमेल हार्मोन का स्तर ज्यादा था, तो वो मर्दों के मुकाबले चीजें याद रखने में कमजोर थीं। लेकिन जब फीमेल हार्मोन का स्तर कम हुआ तो उनकी ये कमजोरी दूर हो गई। वो मर्दों के मुकाबले नए शब्द तेजी से याद रखने लगीं।

जिन शब्दों की अदायगी को लेकर संशय बना रहता है, उन्हें महिलाएं तेजी से और बिल्कुल सही समझ लेती हैं। बेहतर कम्युनिकेशन के लिए इसे खूबी माना जाता है। अपनी रिसर्च के बुनियाद पर मनोवैज्ञानिक मकी मानती हैं कि औरतों में हर महीने होने वाले इस बदलाव की वजह ओएस्ट्रोजन हार्मोन है।

फीमेल हार्मोन दिमाग के दो हिस्सों पर अपना गहरा असर डालते हैं। पहला हिस्सा है हिप्पोकेम्पस जहां तमाम तरह की यादें जमा रहती हैं। हर महीने जब फीमेल हार्मोन रिलीज होते हैं, तो दिमाग का ये हिस्सा बड़ा हो जाता है।

दूसरा असरअंदाज होने वाला हिस्सा है एमिग्डाला। दिमाग के इस हिस्से का संबंध जज्बातों और फैसला करने की ताकत से होता है। हर महीने फीमेल हार्मोन रिलीज होने से महिलाएं दिमाग के इस हिस्से का इस्तेमाल करते हुए किसी भी परिस्थिति को दूसरों के मुकाबले बेहतर तरीके से देखती हैं। हर महीने बढ़ने वाले ओएस्ट्रोजन हार्मोन की वजह से ही महिलाएं किसी भी तरह के डर को पहले से भांप लेती हैं।

मर्दों और औरतों के दिमाग के काम करने के तरीके में एक और बड़ा फर्क है। कोई भी काम करने में मर्दों के दिमाग का एक हिस्सा काम करता है। जबकि औरतों के दिमाग के दोनों हिस्से काम करते हैं। दिमाग के दाएं या बांए हिस्से के काम करने के तरीके का संबंध हाथ से है। मिसाल के लिए अगर कोई अपने दाएं हाथ का इस्तेमाल करता है तो भाषा का ज्ञान उसके दिमाग के बाएं हिस्से में होता है, लेकिन औरतों के दिमाग की संरचना इससे भी अलग होती है। अब ऐसा क्यों है, ये अभी तक रहस्य है।

2002 में की गई रिसर्च के मुताबिक जब औरतों में ओएस्ट्रोजन और प्रोजेस्ट्रोन हार्मोन रिलीज़ होते हैं तभी उनके दिमाग के दोनों हिस्से ज्यादा तेजी से काम करते हैं। इससे महिलाओं की सोचने की क्षमता में लचीलापन आता है। और दिमाग का दायां हिस्सा तेज गति से काम करने लगता है। देखा गया है कि जिन लोगों के दिमाग़ का दायां हिस्सा ज्यादा काम करता है वो गणित के प्रश्न तेजी से हल कर लेते हैं। शरीर में हर महीने होने वाले बदलाव से दिमाग के काम करने के तरीके पर असर पड़ता है। महिलाओं में ये बदलाव पॉजिटिव होते हैं।

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